नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली पर 14 दीप जलाने का है विशेष विधान

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाए जाने वाले पर्व को रूप चौदस, नरक चतुर्दशी और लोकप्रिय रूप से 'छोटी दिवाली' के नाम से जाना जाता है। दीपावली के ठीक एक दिन पहले आने वाले इस पावन पर्व का सनातन धर्म में अत्यधिक गहरा आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज, भगवान श्री कृष्ण, हनुमान जी और माता महालक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, छोटी दिवाली की शाम को घर और बाहर कुल 14 विशेष स्थानों पर दीप प्रज्वलित करने का विधान बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति विधि-विधान के साथ इन चौदह जगहों पर दीपक जलाता है, उसके घर से दरिद्रता रूपी 'अलक्ष्मी' का नाश होता है और परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु (Untimely death) के भय से रक्षा होती है। इस विशेष रात जलाए जाने वाले चौदह दीये न केवल अंधकार को दूर करते हैं, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आयु की रक्षा का वरदान भी लेकर आते हैं।
किन 14 स्थानों पर जलाए जाते हैं दीपक? घर के मुख्य द्वार से लेकर रसोई और पीपल के पेड़ तक का है विधान
शास्त्रों के अनुसार छोटी दिवाली की संध्या के समय यम के निमित्त चौदह दीपकों (यम चौदस दीये) को जलाने की एक निश्चित और पवित्र परंपरा है। आइए जानते हैं वे 14 स्थान कौन से हैं जहां संध्याकाल में घी या सरसों के तेल के दीपक अवश्य प्रज्वलित करने चाहिए। सबसे पहला दीपक घर के मुख्य द्वार के दोनों तरफ रखा जाता है ताकि नकारात्मक शक्तियां प्रवेश न करें। दूसरा दीपक घर के मंदिर या पूजा स्थल में रखा जाता है। तीसरा दीपक रसोई घर में, चौथा पानी के मटके या पीने के पानी के स्थान पर (पितृ स्थान), पांचवां घर के तुलसी के पौधे के पास, छठा पीपल के पेड़ के नीचे, सातवां घर के नजदीक किसी प्राचीन मंदिर में, आठवां कचरा फेंकने या कूड़ेदान के पास, नौवां स्नानघर या बाथरूम के पास, दसवां घर की छत के मुंडेर पर, ग्याहरवां घर की सीढ़ियों पर, बारहवां घर के सबसे अंधेरे कोने में, तेरहवां चौराहे पर (यम के नाम का चौमुखी दीया) और चौदहवां दीपक अपने इष्टदेव या कुल देवता का स्मरण करते हुए जलाया जाता है। इन चौदह स्थानों पर प्रकाश करने से घर के सभी प्रकार के वास्तु दोष स्वतः शांत हो जाते हैं।
अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और यमराज की प्रसन्नता के लिए सूर्यास्त के बाद किया जाता है विशेष दीपदान
छोटी दिवाली की रात यमराज की पूजा और दीपदान का समय सूर्यास्त के ठीक बाद का माना जाता है। इस दिन संध्या के समय पुराने मिट्टी के दीये में सरसों का तेल डालकर उसमें कुछ काले तिल और कौड़ी डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के नाम से दीपक प्रज्वलित किया जाता है, जिसे 'यम का दीया' भी कहा जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार के किसी भी सदस्य पर अकाल मृत्यु का संकट नहीं मंडराता है। इसके साथ ही, रूप चौदस के दिन सुबह सूर्योदय से पहले शरीर पर उबटन लगाकर अपामार्ग (चिरचिटा) की पत्तियों को सिर के ऊपर से घुमाकर स्नान करने का भी विशेष विधान है, जिससे शरीर के सारे रोग और पाप नष्ट हो जाते हैं। छोटी दिवाली का यह पावन पर्व हमें स्वच्छता, आरोग्यता और सकारात्मकता का संदेश देता है, इसलिए इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ इन चौदह दीपकों को जलाकर अपने परिवार के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु की कामना अवश्य करनी चाहिए।