धर्म

क्या सिर्फ सेक्युलर बनकर रह गया ओणम? ईद-क्रिसमस के बीच त्योहारों की धार्मिक जड़ों को लेकर क्यों छिड़ी है देशव्यापी बहस

भारत विविधताओं, आस्थाओं और जीवंत त्योहारों का देश है, जहां हर पर्व की अपनी एक गहरी ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि रही है। लेकिन हाल के वर्षों में दक्षिण भारत के सबसे प्रमुख पर्वों में से एक 'ओणम' (Onam) को लेकर एक व्यापक वैचारिक और सांस्कृतिक बहस छिड़ गई है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब दुनिया भर में ईद और क्रिसमस जैसे बड़े त्योहारों की विशिष्ट धार्मिक पहचान और उनके धार्मिक नियमों को पूरी तरह स्वीकार किया जाता है, तो फिर ओणम जैसे प्राचीन पर्व को केवल एक 'धर्मनिरपेक्ष' या 'सांस्कृतिक फसल उत्सव' (Harvest Festival) के रूप में सीमित करने का प्रयास क्यों किया जा रहा है?

सांस्कृतिक चिंतकों, इतिहासकारों और धार्मिक संगठनों का एक वर्ग यह तर्क दे रहा है कि आधुनिकता और सेक्युलर नैरेटिव के नाम पर भारतीय त्योहारों की मूल धार्मिक और पौराणिक आत्मा को नजरअंदाज किया जा रहा है। वहीं, दूसरा पक्ष इसे केरल के सामाजिक सौहार्द, साझा संस्कृति और भाषाई एकता के प्रतीक के रूप में देखता है, जहां जाति और धर्म की सीमाओं से परे जाकर हर वर्ग इस उत्सव में शामिल होता है।

पौराणिक कथा बनाम सांस्कृतिक नैरेटिव: क्या है ओणम का मूल आधार?

सनातन धर्म की पौराणिक परंपराओं और श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, ओणम का संबंध भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान वामन और न्यायप्रिय दैत्यराज राजा महाबली (मावेली) की पावन कथा से जुड़ा हुआ है।

पौराणिक मान्यता है कि राजा महाबली के त्याग, दानशीलता और प्रजा-प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उन्हें पाताल लोक का राजा बनाया था और वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने का वरदान दिया था। केरल में थिरुवोनम के दिन राजा महाबली के इसी आगमन की स्मृति में घर-घर दीप जलाए जाते हैं, फूलों की रंगोली (पूकलम) बनाई जाती है और पारंपरिक दावत (ओणम साद्या) का आयोजन होता है।

इसके साथ ही, केरल के प्रसिद्ध 'थ्रिक्काकरा मंदिर' (Thrikkakara Temple) में ओणम के दौरान भगवान वामन की मुख्य रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। यही कारण है कि एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि ओणम का आधार पूरी तरह से वैदिक और हिंदू पौराणिक संदर्भों में निहित है, और इसे सिर्फ एक मौसमी आयोजन कहना इसके मूल इतिहास को कमजोर करने जैसा है।

ईद और क्रिसमस की तुलना में ओणम पर क्यों उठते हैं सवाल?

इस पूरे विमर्श में सबसे बड़ा बिंदु अन्य वैश्विक धर्मों के त्योहारों के साथ तुलना को लेकर आता है। आलोचकों का कहना है कि:

  • विशिष्ट धार्मिक पहचान: जिस प्रकार क्रिसमस ईसा मसीह के जन्मोत्सव से जुड़ा है और ईद-उल-फितर व ईद-उल-अजहा विशुद्ध रूप से इस्लामी परंपरा और पैगंबर की शिक्षाओं से संबंधित हैं, उन्हें कभी भी उनकी धार्मिक पहचान से अलग करके केवल 'खान-पान का मेला' नहीं बनाया जाता।

  • समान मानकों की मांग: भारतीय परंपरा के पैरोकारों का कहना है कि जब अन्य धर्मों के त्योहारों की पवित्रता और उनके धार्मिक अनुष्ठानों को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया जाता है, तो हिंदू संदर्भ वाले पर्वों—जैसे ओणम, पोंगल या दिवाली—को केवल पंथनिरपेक्ष आयोजन के रूप में पेश करने की प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है?

  • इतिहास का विखंडन: कई विचारकों का आरोप है कि राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे के तहत राजा महाबली और भगवान वामन के बीच एक वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) की झूठी तस्वीर पेश करने की कोशिश की जाती है, जिससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है।

केरल का सामाजिक दृष्टिकोण: साझा संस्कृति और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक

दूसरी ओर, केरल के समाजशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों और स्थानीय नागरिकों का एक मजबूत दृष्टिकोण यह भी है कि ओणम सदियों से केरल की 'मलयाली अस्मिता' का अभिन्न अंग रहा है।

केरल का इतिहास रहा है कि वहां विभिन्न धर्मों के लोग—चाहे वे हिंदू हों, ईसाई हों या मुस्लिम—ओणम को अपनी मिट्टी, खेती और नई फसल की खुशी के रूप में एक साथ मनाते हैं। इस पक्ष का मानना है कि ओणम को सर्वसमावेशी बनाए रखने से इसकी महत्ता घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है, क्योंकि यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की मूल भावना को धरातल पर चरितार्थ करता है। उनके अनुसार, ओणम को किसी एक दायरे में बांधने के बजाय इसे एक ऐसा मंच माना जाना चाहिए जो पूरे समाज को आपसी सद्भाव के सूत्र में पिरोता है।

सांस्कृतिक विरासत और आस्था के बीच संतुलन की आवश्यकता

इस पूरी बहस का निष्कर्ष यही निकलता है कि किसी भी प्राचीन पर्व की असली ताकत उसकी जड़ों की सच्चाई और उसके संदेश में होती है। ओणम की लोकप्रियता और उसका सांस्कृतिक विस्तार निश्चित रूप से सभी को साथ लेकर चलने वाला है, लेकिन इसके साथ ही इसके पीछे छिपे आध्यात्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भों का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है।

त्योहारों की आत्मा को संरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि उनकी ऐतिहासिक परंपराओं को तोड़े-मरोड़े बिना आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए, ताकि सामाजिक सौहार्द भी बना रहे और सांस्कृतिक विरासत की पहचान भी अक्षुण्ण रहे।

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