Buddhist Traditions : बिना सात फेरे और सिंदूर के कैसे होती है बौद्ध शादी? जानें मंत्रों से लेकर जल अभिषेक तक की पूरी प्रक्रिया

News India Live, Digital Desk: दुनिया के अलग-अलग धर्मों में विवाह को लेकर अपनी-अपनी मान्यताएं हैं। जहां सनातन धर्म में इसे सात जन्मों का बंधन और ‘संस्कार’ माना जाता है, वहीं इस्लाम में यह एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ (निकाह) है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शांति और करुणा का मार्ग दिखाने वाले बौद्ध धर्म में शादियां कैसे होती हैं? बौद्ध विवाह अपनी सादगी, फिजूलखर्ची से दूरी और गौतम बुद्ध के विचारों के प्रति अटूट श्रद्धा के लिए जाने जाते हैं। आइए जानते हैं बौद्ध विवाह की वह प्रक्रिया जो इसे अन्य धर्मों से बिल्कुल अलग और खास बनाती है।संस्कार नहीं, एक सामाजिक व्यवस्था है ‘विवाह’बौद्ध धर्म के जानकारों के अनुसार, यहां विवाह को कोई अलौकिक या धार्मिक संस्कार नहीं माना जाता। भगवान बुद्ध ने विवाह को एक ‘सामाजिक व्यवस्था’ और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारी के रूप में देखा। यही कारण है कि बौद्ध विवाह में कुंडली मिलान, शुभ मुहूर्त, सिंदूर या अग्नि के सात फेरे जैसी परंपराएं अनिवार्य नहीं होतीं। यहां शादी का आधार प्रेम, आपसी सम्मान और वफादारी है।कैसे शुरू होता है रस्मों का सिलसिला?बौद्ध शादियों में सगाई (Engagement) अनिवार्य नहीं है, लेकिन आधुनिक समय में परिवार आपसी सहमति से तिथि तय करते हैं। इसके लिए कोई ज्योतिषीय मुहूर्त नहीं देखा जाता। सगाई के दौरान वर-वधू अक्सर सफेद वस्त्र धारण करते हैं और अंगूठियों का आदान-प्रदान करते हैं। कार्यक्रम में मौजूद बौद्ध भिक्षु जोड़े को अपना आशीर्वाद देते हैं।मंडप की सजावट और ‘बुद्ध वंदना’विवाह समारोह घर, विहार (मठ) या किसी हॉल में आयोजित होता है। समारोह स्थल पर एक मेज पर सफेद कपड़ा बिछाकर भगवान बुद्ध की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। प्रतिमा के सामने मोमबत्ती, अगरबत्ती, ताजे फूल, पीपल के पत्ते, पानी का लोटा और फल-खीर रखे जाते हैं।विवाह की शुरुआत में वर-वधू और उपस्थित सभी लोग बुद्ध की ओर मुख करके बैठते हैं और पवित्र मंत्रों का जाप करते हैं:त्रिशरण: ‘बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि’।पंचशील: पांच नैतिक प्रतिज्ञाओं का पाठ किया जाता है।पूजा गाथा: दीप, धूप और पुष्प अर्पित करते हुए बुद्ध की वंदना की जाती है।पिता का संकल्प और वर-वधू की शपथबौद्ध विवाह में एक खास रस्म होती है जिसमें कन्या के पिता दाहिने हाथ से लोटे का जल वर-वधू के जुड़े हुए हाथों पर डालते हैं। यह समर्पण का प्रतीक है। इसके बाद वर-वधू एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों की शपथ लेते हैं:पति की शपथ: वह पत्नी का सम्मान करेगा, वफादार रहेगा, घर के कार्यों में सहयोग करेगा और उसे उपहार देकर प्रसन्न रखेगा।पत्नी की शपथ: वह घर का कुशल प्रबंधन करेगी, मेहमानों का सत्कार करेगी, पति के प्रति वफादार रहेगी और परिवार की संपत्ति की सुरक्षा करेगी।जल अभिषेक और मंगल सुत्त का पाठशपथ लेने के बाद बौद्ध भिक्षु ‘मंगल सुत्त’ या ‘जयमंगल गाथा’ का पाठ करते हैं। इस दौरान वर-वधू के हाथों पर जल छिड़का जाता है या उनके हाथों में सुरक्षा का प्रतीक ‘सफेद धागा’ बांधा जाता है। अंत में वर-वधू एक-दूसरे को वरमाला पहनाते हैं और भिक्षु उन्हें बुद्ध की माला (प्रसाद स्वरूप) पहनाकर विवाह संपन्न कराते हैं।सादगी और दहेज मुक्त विदाईबौद्ध विवाह की पूरी प्रक्रिया मात्र 30 मिनट से एक घंटे में संपन्न हो जाती है। समारोह के अंत में सबसे पहले भिक्षु-संघ को भोजन (दान) कराया जाता है, उसके बाद अतिथि भोजन करते हैं। बौद्ध धर्म में दहेज लेना या दिखावे के लिए फालतू खर्च करना निषिद्ध माना गया है। उपहार के रूप में स्वेच्छा से दी गई वस्तुएं ही स्वीकार की जाती हैं।