CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग चक्रव्यूह: क्या संसद में टिक पाएगा प्रस्ताव

देश की चुनावी शुचिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर राजधानी दिल्ली के सत्ता के गलियारों में एक नया और भीषण राजनीतिक संग्राम छिड़ गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तौर-तरीकों और निर्वाचन आयोग के आंतरिक फैसलों को लेकर विपक्षी खेमे ने अभूतपूर्व आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। चुनाव आयोग के भीतर दो साथी चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों और असहमति को दरकिनार कर एसआईआर (SIR) से जुड़े अहम नीतिगत मामलों पर एकतरफा निर्णय लेने के आरोपों से घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए विपक्षी दल अब औपचारिक रूप से नए महाभियोग (इंपीचमेंट) प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने में जुट गए हैं। आईएनडीआईए (INDIA) गठबंधन के रणनीतिकारों ने इस बार अपनी रणनीति को और अधिक व्यापक व आक्रामक रूप देते हुए गठबंधन से बाहर की गैर-भाजपा क्षेत्रीय पार्टियों को भी इस महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में लामबंद करने की व्यवस्थित कवायद शुरू कर दी है। विपक्षी खेमे का उद्देश्य स्पष्ट है कि संसद के दोनों सदनों में केवल विरोध दर्ज न कराया जाए, बल्कि एक ठोस संवैधानिक चुनौती पेश करके चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर व्यापक राष्ट्रीय बहस खड़ी की जाए।
संख्याबल का जटिल गणित: सत्तापक्ष के सहयोग बिना प्रस्ताव पारित होना असंभव
भले ही विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद के भीतर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन कर रहे हों, लेकिन इस महाभियोग प्रस्ताव को वास्तविक अंजाम तक पहुंचाना किसी भी सूरत में आसान नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया ठीक वही है जो सर्वोच्च न्यायालय के किसी आसीन न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित की गई है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत यानी सदन की कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई (two-thirds) समर्थन की अनिवार्य संवैधानिक आवश्यकता होती है। संसद के मौजूदा अंकगणित को देखा जाए तो सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास दोनों सदनों में निर्णायक संख्याबल मौजूद है। जब तक सत्तापक्ष के घटक दलों में कोई बड़ी राजनीतिक बगावत नहीं होती या वे विपक्ष के प्रस्ताव के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग नहीं करते, तब तक इस प्रस्ताव का संसद से पारित होना तकनीकी रूप से असंभव प्रतीत होता है। इसके बावजूद, कांग्रेस, द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों का मानना है कि आम आदमी पार्टी (AAP) और क्षेत्रीय दलों के सांसदों के हस्ताक्षरों से युक्त प्रस्ताव पेश करना ही अपने आप में एक शक्तिशाली राजनीतिक संदेश देगा कि देश की संस्थागत विश्वसनीयता पर गंभीर संकट है।
कांग्रेस का आक्रामक रुख: पवन खेड़ा बोले- बाहरी दल भी आएंगे साथ
इस पूरे संवैधानिक अभियान का नेतृत्व कर रही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह चुनाव आयोग के मौजूदा कार्यकलापों के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक पीछे हटने वाली नहीं है। कांग्रेस मीडिया व संचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए पुष्टि की कि इस बार महाभियोग की रूपरेखा केवल गठबंधन तक सीमित नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से निरंतर संवाद जारी है और जो दल वर्तमान में आईएनडीआईए ब्लॉक का हिस्सा नहीं हैं, वे भी लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के संरक्षण के लिए इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं। कांग्रेस का आरोप है कि निर्वाचन आयोग में वर्तमान में लिए जा रहे निर्णय पारदर्शिता और सहमति के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ हैं, जिसके चलते देश के प्रमुख कानूनविदों और न्यायविदों से राय-मशविरा लेकर एक विस्तृत आरोप-पत्र (चार्जशीट) तैयार किया जा रहा है ताकि आयोग की कार्यप्रणाली की वास्तविक स्थिति जनता के सामने आ सके।
द्रमुक और आप की दो-टूक हामी: टीएमसी के डेरेक ओब्रायन ने संभाली कमान
कांग्रेस के इस सियासी दांव को दक्षिण भारत से द्रमुक (DMK) का सीधा और मजबूत समर्थन मिल गया है। द्रमुक के वरिष्ठ नेता और मुख्य प्रवक्ता टी के एस इलानगोवन ने दो टूक शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आने वाले महाभियोग प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन करेगी। इलानगोवन ने स्पष्ट किया कि पार्टी के शीर्ष नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने पहले ही अपनी स्थिति साफ कर दी है कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त निष्पक्षता के संवैधानिक मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं और उन्हें तत्काल पद से मुक्त किया जाना चाहिए। वहीं, संसद के उच्च सदन में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता डेरेक ओब्रायन इस अभियान के प्रमुख रणनीतिकार बनकर उभरे हैं। ओब्रायन ने घोषणा की है कि टीएमसी व्यक्तिगत रूप से पहल करते हुए आम आदमी पार्टी और अन्य तटस्थ दलों को इस प्रस्ताव के तहत एकजुट करने का काम करेगी। विपक्षी दलों की इस समन्वित सक्रियता से साफ है कि आने वाले संसदीय सत्र में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिलेगा।
दिग्गज वकीलों का पैनल: कपिल सिब्बल और सिंघवी परख रहे कानूनी पेंच
राजनीतिक समर्थन जुटाने के साथ-साथ विपक्षी दल इस बात का पूरा ध्यान रख रहे हैं कि इस बार उनका महाभियोग नोटिस किसी तकनीकी या कानूनी आधार पर खारिज न हो सके। इसके लिए कांग्रेस और विपक्षी दलों के शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों की एक कोर कमेटी गठित की गई है। सूत्रों के अनुसार, प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, विवेक तन्खा, पूर्व केंद्रीय मंत्री व राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और डॉ. मेनका गुरुस्वामी जैसे शीर्ष कानूनविदों के साथ विचार-विमर्श शुरू हो चुका है। यह कानूनी टीम मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए गए हालिया प्रशासनिक फैसलों, आयोग के आंतरिक मतभेदों, सर्विस नियमों के कथित उल्लंघनों और संवैधानिक अनुच्छेदों का गहन अध्ययन कर रही है ताकि नोटिस में लगाए गए आरोपों को अकाट्य बनाया जा सके और पीठासीन अधिकारी के समक्ष कोई प्रक्रियात्मक खामी न रहे।
पहले नोटिस की विफलता से सबक: दोनों सदनों में अलग-अलग रणनीति
विपक्ष की इस नई और सतर्क रणनीति के पीछे उसका पिछला कड़वा अनुभव भी एक बड़ा कारण है। इससे पहले राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष द्वारा दिए गए पूर्व महाभियोग नोटिस को प्रक्रियात्मक और तकनीकी आधारों पर खारिज कर दिया था। उस विफलता से सबक लेते हुए विपक्षी रणनीतिकार इस बार पीठासीन अधिकारियों को कोई ऐसा कानूनी लूपहोल नहीं देना चाहते जिसके आधार पर नोटिस को शुरुआत में ही निरस्त किया जा सके। सूत्रों का कहना है कि रणनीति के तहत लोकसभा (जहां कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं) और राज्यसभा (जहां कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं) दोनों के लिए अलग-अलग नोटिस तैयार किए जा रहे हैं। सांसदों के आवश्यक हस्ताक्षर जुटाने के बाद सभी विपक्षी दलों के शीर्ष फ्लोर लीडर्स की एक संयुक्त बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें यह अंतिम फैसला होगा कि राजनीतिक प्रभाव और विधायी दबाव की दृष्टि से नोटिस को पहले लोकसभा में पेश किया जाए अथवा राज्यसभा के पटल पर रखा जाए।