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Chhath Puja Travel Crisis: छठ पर घर जाने की मजबूरी या लूट? पटना का हवाई किराया लंदन से भी महंगा, ट्रेनों में ‘नो रूम’ के बीच कैसे घर पहुंचेगा परदेशी?

आस्था, शुचिता और लोक परंपरा के सबसे बड़े महापर्व छठ पूजा की आहट के साथ ही देश के महानगरों में रोजी-रोटी कमाने गए लाखों प्रवासियों के दिल में अपने गांव-घर लौटने की तड़प जाग उठी है। मां का बुलावा है, घाट की मिट्टी की सौंधी खुशबू है और खरना व अर्घ्य का इंतजार है, लेकिन इस पवित्र भावना के सामने परिवहन व्यवस्था की बेरुखी और निजी एयरलाइंस की अंधाधुंध मुनाफाखोरी ने ऐसा पहाड़ खड़ा कर दिया है कि परदेसियों के आंसू छलक रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे महानगरों से पटना और दरभंगा का एक तरफ का हवाई टिकट 25,000 रुपये से लेकर 32,000 रुपये तक के ऐतिहासिक स्तर को छू चुका है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि दिल्ली से विदेशी डेस्टिनेशन या दुबई जाना सस्ता पड़ रहा है, जबकि अपने ही मुल्क में डेढ़-दो घंटे की घरेलू उड़ान के लिए खून-पसीने की पूरी गाढ़ी कमाई चुकानी पड़ रही है।लखनऊClick to open side panel for more information और अन्य ट्रांजिट शहरों से होकर बिहार जाने वाली नियमित ट्रेनों में महीनों पहले से 'नो रूम' (No Room) और 300 के पार वेटिंग लिस्ट का बोर्ड लटक चुका है। ऐसे में यह सवाल हर आम बिहारी के जेहन में गूंज रहा है कि क्या छठ पर घर लौटना अब केवल अमीरों का विशेषाधिकार बनकर रह गया है?

लंदन का टिकट सस्ता, लेकिन पटना-दरभंगा के लिए खुली लूट

त्योहारी सीजन में एयरलाइंस की डायनेमिक फेयर प्रणाली (Dynamic Pricing System) किस कदर अनियंत्रित हो जाती है, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण छठ पूजा के दौरान बिहार के हवाई रूट्स पर साफ दिखाई दे रहा है। आमतौर पर दिल्ली से पटना का जो हवाई किराया 4,500 से 6,000 रुपये के बीच रहता है, वह छठ के ठीक पहले की तिथियों (23 से 26 अक्टूबर के बीच) में सीधे 24,000 से 28,000 रुपये तक पहुंच गया है। मुंबई या बेंगलुरु से पटना और दरभंगा के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट्स के रेट तो 30,000 से 35,000 रुपये के आंकड़े को भी पार कर रहे हैं। यदि इसकी तुलना अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से की जाए, तो ऑफ-सीजन या एडवांस बुकिंग में दिल्ली से दुबई या बैंकॉक का रिटर्न टिकट और मध्य-पूर्व के कई देशों का एक तरफ का किराया 18,000 से 22,000 रुपये में मिल जाता है। एक सामान्य वेतनभोगी कर्मचारी, जो महीने में 30-40 हजार रुपये कमाता है, उसके लिए अपने परिवार सहित घर जाने का हवाई खर्च ही लाख रुपये के पार बैठ रहा है। हर साल की तरह इस बार भी नागरिक उड्डयन मंत्रालय से किराए पर कैप (Airfare Cap) लगाने की गुहार लगाई जा रही है, लेकिन निजी एयरलाइंस मांग और आपूर्ति के अंतर का पूरा फायदा उठाकर टिकटों को मनमाने दामों पर बेच रही हैं।

ट्रेनों में 'नो रूम' का सन्नाटा और तत्काल टिकट का असंभव चक्रव्यूह

जो प्रवासी हवाई जहाज का भारी-भरकम खर्च वहन नहीं कर सकते, उनके लिए भारतीय रेल ही एकमात्र जीवनरेखा होती है। लेकिन रेल पटरियों पर भी परदेसियों की उम्मीदें दम तोड़ती नजर आ रही हैं। नई दिल्ली-पटना संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, मगध एक्सप्रेस, श्रमजीवी एक्सप्रेस, वैशाली एक्सप्रेस, डिब्रूगढ़ राजधानी और बिहार संपर्क क्रांति जैसी तमाम मुख्य ट्रेनों में स्लीपर से लेकर थर्ड एसी और सेकंड एसी तक में 'रिग्रेट' (Regret) और 'नो रूम' की स्थिति बन चुकी है। इसका अर्थ यह है कि रेलवे ने अब इन तिथियों के लिए वेटिंग टिकट जारी करना भी बंद कर दिया है। तत्काल कोटा खुलने के चंद सेकंडों के भीतर आईआरसीटीसी (IRCTC) की वेबसाइट और ऐप पर सर्वर स्लो होने और ऑटोमेटेड दलालों के सॉफ्टवेयर के चलते टिकट पलक झपकते ही गायब हो जाते हैं। सामान्य मजदूर और मध्यमवर्गीय यात्री काउंटर पर रात-रात भर लाइन लगाने के बाद भी खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं।

छठ पूजा स्पेशल ट्रेनें: राहत की उम्मीद या भारी भीड़ का संघर्ष

लाखों प्रवासियों के भारी दबाव को देखते हुए भारतीय रेलवे ने इस वर्ष रिकॉर्ड संख्या में 'छठ और दिवाली स्पेशल ट्रेनों' (Special Trains) के संचालन का ऐलान किया है। पूर्व मध्य रेलवे (ECR) और उत्तर रेलवे ने दिल्ली, मुंबई, गुजरात और पंजाब से पटना, दानापुर, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, सहरसा, जयनगर और कटिहार के लिए सैकड़ों अतिरिक्त फेरे अधिसूचित किए हैं। इसके अलावा, रेलवे ने अनारक्षित सामान्य डिब्बों (General Coaches) की संख्या बढ़ाने और क्लोन ट्रेनें चलाने की योजना भी बनाई है। नई दिल्ली, आनंद विहार और पटना जंक्शन पर यात्रियों की सुरक्षा और सुगम आवागमन के लिए होल्डिंग एरिया और विशेष बैरिकेडिंग की गई है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि इन स्पेशल ट्रेनों में भी पैर रखने की जगह नहीं मिल रही है। 24 से 30 घंटे के इस लंबे सफर में बोगियों के शौचालयों के पास और गलियारों में बैठकर सफर करना यात्रियों की मजबूरी बन चुका है।

डग्गामार बसें और निजी ट्रैवल ऑपरेटर्स भी वसूल रहे तीन गुना किराया

ट्रेनों और फ्लाइट्स से मायूस होने के बाद प्रवासियों का अंतिम सहारा निजी स्लीपर बसें बनती हैं। लेकिन निजी बस ऑपरेटरों ने भी इस मजबूरी का भरपूर फायदा उठाना शुरू कर दिया है। दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम और जयपुर से पटना, गया और मुजफ्फरपुर जाने वाली प्राइवेट बसों का सामान्य किराया, जो अमूमन ₹1,200 से ₹1,500 होता है, उसे बढ़ाकर ₹4,000 से ₹6,000 प्रति सीट कर दिया गया है। इतना अधिक किराया देने के बावजूद इन बसों में ओवरलोडिंग, सुरक्षा की कमी और 36 से 40 घंटे के भीषण ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ रहा है। लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के टोल प्लाजा पर त्योहारी दिनों में भारी वाहनों का रेला लग जाता है, जिससे यात्रियों का सफर और अधिक कष्टप्रद हो जाता है।

घर पहुंचने की जद्दोजहद में परदेसियों के लिए कुछ व्यावहारिक उपाय

इस विषम परिस्थिति के बीच जो लोग किसी भी कीमत पर घर पहुंचना चाहते हैं, उनके लिए यात्रा विशेषज्ञों ने कुछ वैकल्पिक तरीके सुझाए हैं:

  • ब्रेक जर्नी (Break Journey) फॉर्मूला: सीधे दिल्ली-पटना या मुंबई-पटना की तलाश करने के बजाय यात्रा को दो हिस्सों में बांटें। उदाहरण के लिए, दिल्ली से लखनऊ, प्रयागराज या वाराणसी तक किसी सुपरफास्ट या वंदे भारत ट्रेन से पहुंचें और वहां से स्थानीय इंटरसिटी, मेमू (MEMU) या राज्य परिवहन निगम की बसों के जरिए बिहार के जिलों में प्रवेश करें।

  • ताजा स्पेशल ट्रेनों की रोजाना मॉनिटरिंग: रेलवे लगातार तात्कालिक मांग के आधार पर 24 से 48 घंटे के नोटिस पर नई स्पेशल ट्रेनों और अतिरिक्त कोचों की घोषणा करता है। आईआरसीटीसी पर सुबह 8 बजे और दोपहर 2 बजे नए नोटिफिकेशंस पर पैनी नजर रखें।

  • कारपूलिंग और साझा टैक्सी सेवा: दिल्ली-एनसीआर से एक ही शहर जाने वाले 4-5 लोग मिलकर निजी कैब या कारपूलिंग प्लेटफॉर्म्स का सहारा ले सकते हैं। इससे प्रति व्यक्ति खर्च एयरलाइंस की तुलना में काफी कम रहेगा और समय की भी बचत होगी।

  • गोरखपुर और बनारस रूट का इस्तेमाल: यदि पटना या दरभंगा के टिकट नहीं मिल रहे हैं, तो गोरखपुर, दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (मुगलसराय) या वाराणसी तक का टिकट लें, जहां से छपरा, सीवान और गोपालगंज के लिए लगातार कनेक्टिविटी उपलब्ध रहती है।

आस्था का महापर्व और व्यवस्था से उठता भरोसा

छठ केवल चार दिनों का पर्व नहीं, बल्कि बिहार और पूर्वांचल की आत्मा है। साल भर प्रदेश से बाहर रहकर हाड़तोड़ पसीना बहाने वाला मजदूर हो या किसी एमएनसी में काम करने वाला इंजीनियर, हर किसी की दिली ख्वाहिश होती है कि वह अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देते समय अपनी मां और परिवार के साथ गंगा या पोखर के किनारे मौजूद रहे। लेकिन हर साल त्योहारी सीजन में परिवहन का यह विकराल संकट और प्रशासनिक लाचारी साबित करती है कि प्रवासियों की इस गहरी भावना को आज भी एक व्यवस्थित और नियंत्रित नीतिगत समाधान की दरकार है। जब तक एयरफेयर पर स्थायी सीमा और पारदर्शी स्पेशल ट्रेनों का मजबूत तंत्र विकसित नहीं होगा, तब तक हर छठ पर परदेसियों का यह दर्द यूं ही छलकता रहेगा।

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