अब मनमर्जी से पैसा नहीं बहा पाएंगे ग्राम प्रधान! इस राज्य सरकार का बड़ा कदम, खर्चों पर कड़ा पहरा लगाने की तैयारी

ग्रामीण विकास और पंचायती राज व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया जा रहा है। अब ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर ग्राम प्रधान या सरपंच अपनी मर्जी से सरकारी पैसा खर्च नहीं कर पाएंगे। सरकारी खजाने के दुरुपयोग को रोकने और भ्रष्टाचार पर पूरी तरह लगाम लगाने के उद्देश्य से राज्य सरकार एक नया और बेहद सख्त कानून लाने की तैयारी कर रही है। इस नए कानून के लागू होते ही ग्राम पंचायतों को मिलने वाले फंड और उसके खर्च करने की पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखने को मिलेगा, जिससे प्रधानों के असीमित अधिकारों पर सीधे तौर पर अंकुश लग जाएगा।
पंचायत फंड की निगरानी के लिए बनेगा डिजिटल और प्रशासनिक चक्रव्यूह
प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस नए प्रस्तावित कानून के तहत ग्राम पंचायतों को मिलने वाले केंद्रीय और राज्य वित्त आयोग के बजट के इस्तेमाल की प्रक्रिया को पूरी तरह से अपग्रेड किया जा रहा है। अब किसी भी विकास कार्य के लिए फंड जारी करने से पहले उसकी प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति (Technical Approval) अनिवार्य होगी। इसके साथ ही, खर्च की जाने वाली पाई-पाई का पूरा हिसाब ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करना होगा। अब तक कई मामलों में देखा गया है कि ग्राम प्रधान अपने चहेते ठेकेदारों को काम देकर कागजों पर ही विकास कार्य निपटा देते थे, लेकिन अब बिना जियो-टैगिंग (Geo-tagging) और अधिकारियों के भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के वेंडर को एक रुपये का भी भुगतान नहीं किया जा सकेगा।
स्थानीय स्तर पर बढ़ेगा आम जनता और ग्राम सभा का दखल
सरकार के इस नए कदम का एक सबसे बड़ा पहलू यह है कि अब विकास कार्यों की योजना तय करने में ग्राम सभा और स्थानीय ग्रामीणों की भूमिका को सबसे ऊपर रखा जाएगा। नए नियमों के अनुसार, किसी भी नाली, खड़ंजा, स्ट्रीट लाइट या सामुदायिक भवन के निर्माण का प्रस्ताव पहले खुली बैठक में ग्रामीणों के सामने पास कराना होगा। इसके बाद ही उसे आगे की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इस भौगोलिक और स्थानीय ऑप्टिमाइजेशन से न केवल गांवों का वास्तविक विकास सुनिश्चित होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर होने वाली गुटबाजी और धांधली पर भी पूरी तरह से ताला लग जाएगा।
ऑडिट नियमों में सख्ती से प्रधानों की बढ़ेगी टेंशन
नए कानून के तहत हर वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर ग्राम पंचायतों का रैंडम थर्ड-पार्टी सोशल ऑडिट (Social Audit) कराया जाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। यदि किसी भी कार्य में वित्तीय अनियमितता या घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल पाया जाता है, तो इसके लिए सीधे तौर पर ग्राम प्रधान और संबंधित सचिव (सेक्रेटरी) को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। दोषियों से न केवल सरकारी पैसे की रिकवरी की जाएगी, बल्कि उनके चुनाव लड़ने पर भी आजीवन प्रतिबंध लगाने जैसे कड़े प्रावधान इस कानून का हिस्सा हो सकते हैं। सरकार के इस सख्त रुख से जहां एक तरफ ईमानदार जनपदों में खुशी है, वहीं मनमर्जी करने वाले प्रधानों की धड़कनें तेज हो गई हैं।