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E20 Petrol Pros and Cons: क्या एथेनॉल ब्लेंडिंग से सच में होगा पर्यावरण का फायदा? समझिए इस पॉलिसी के 5 बड़े नीतिगत पहलू

इस्लामिक दर्शन और सूफी तालीम के मुताबिक, इंसान इस खूबसूरत जमीन का मालिक नहीं, बल्कि खुदा की तरफ से भेजा गया एक 'अमीन' यानी अमानतदार है. पवित्र कुरआन हमेशा इंसाफ करने, संसाधनों की फिजूलखर्ची से बचने और धरती पर किसी भी तरह का फसाद या बिगाड़ न फैलाने की सख्त तालीम देता है. इसी दार्शनिक और अखलाकी (नैतिक) नजरिए से अगर देखा जाए, तो जब भी कोई सरकारी नीति पानी, खेती, पर्यावरण और एक अदने से आम आदमी की जिंदगी पर कोई दूरगामी असर डालती है, तो उस पर स्वस्थ जम्हूरी (लोकतांत्रिक) बहस करना बेहद जरूरी हो जाता है.

इसी संदर्भ में देश के मौजूदा फ्यूल सिस्टम में लागू हो रहे E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल मिश्रण) नीति पर गहराई से गौर करने की आवश्यकता है. केंद्र सरकार का तर्क है कि इस कदम से कच्चे तेल का आयात घटेगा, भारी विदेशी मुद्रा की बचत होगी, किसानों की आमदनी बढ़ेगी और पर्यावरण को फायदा होगा. सरकार के ये मकसद यकीनन बेहद नेक हैं, लेकिन देश के नीतिगत और वैज्ञानिक गलियारों में इस बात को लेकर एक गंभीर बहस छिड़ गई है कि क्या इस मुकाम को हासिल करने का यही सबसे सही और टिकाऊ रास्ता है?

1. पानी का महा-संकट: क्या ईंधन के लिए 'भूजल' की बलि चढ़ाना सही है?

E20 पॉलिसी के सामने सबसे पहला और सबसे बुनियादी सवाल देश के जल संसाधनों का है. भारत आज इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट (Water Crisis) के दौर से गुजर रहा है. भारत में उत्पादित होने वाले एथेनॉल का एक बहुत बड़ा हिस्सा गन्ने (Sugarcane) और मक्के जैसी फसलों के जरिए तैयार किया जाता है.

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, गन्ना एक ऐसी नकदी फसल है जिसे उगाने में बेहिसाब पानी की जरूरत होती है. जब देश के कई प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में भूजल (Groundwater) का स्तर लगातार खतरनाक ढंग से नीचे जा रहा हो, तब गाड़ियों को दौड़ाने वाले ईंधन को तैयार करने के लिए पानी की इतनी बड़ी मात्रा को झोंक देना कहाँ तक मुनासिब है? एक तरफ सरकार आम जनता से पानी की हर एक बूंद बचाने की अपील करती है, वहीं दूसरी तरफ उसी पानी का इस्तेमाल ईंधन बनाने में हो रहा है— यह एक बड़ा नीतिगत विरोधाभास (Tazad) है.

2. 'फूड बनाम फ्यूल' की जंग और घटता माइलेज

  • आम उपभोक्ता की जेब पर असर: एथेनॉल की आंतरिक ऊर्जा क्षमता (Energy Density) शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले काफी कम होती है. यही वजह है कि ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ मानते हैं कि E20 ईंधन का इस्तेमाल करने पर गाड़ियों के माइलेज में कमी आ सकती है. यदि पेट्रोल के दाम जस के तस रहें और आपकी गाड़ी का माइलेज घट जाए, तो आखिरकार इस महंगाई का सीधा बोझ आम उपभोक्ता की जेब पर ही पड़ेगा.

  • थाली या गाड़ियों का टैंक?: इससे भी बड़ा संकट "फूड बनाम फ्यूल" (भोजन बनाम ईंधन) का है. जब अनाज, मक्का और गन्ने का एक बड़ा हिस्सा इंसानों के पेट के बजाय गाड़ियों के फ्यूल टैंक में जाने लगेगा, तो खाद्य सुरक्षा को लेकर सवाल उठना लाजिमी है. भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ आज भी एक बहुत बड़ी आबादी सरकारी राशन और सस्ती खाद्य व्यवस्था पर निर्भर है, वहाँ इस संवेदनशील पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

3. करोड़ों पुराने वाहनों की तकनीकी चुनौतियां

भारत की सड़कों पर आज भी करोड़ों की तादाद में ऐसे पुराने दोपहिया (Bikes) और चारपहिया (Cars) वाहन दौड़ रहे हैं, जिन्हें E20 या उससे अधिक एथेनॉल मिश्रण के हिसाब से डिजाइन ही नहीं किया गया था. ऑटोमोबाइल दिग्गजों और मैकेनिकल इंजीनियर्स का कहना है कि पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा 10% से ज्यादा होने पर पुरानी गाड़ियों की रबर सील, फ्यूल लाइन्स, कार्ब्युरेटर और कुछ खास प्लास्टिक पुर्जों में जंग लगने या उनके गलने का खतरा बढ़ जाता है. अगर भविष्य में सामान्य पेट्रोल मिलना पूरी तरह बंद हो जाए, तो इन करोड़ों पुरानी गाड़ियों के मालिकों के सामने एक बड़ा तकनीकी और आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा.

4. पर्यावरण का असली सच: वेल-टू-व्हील (Well-to-Wheel) एनालिसिस

정부 (सरकार) का दावा है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ियों से निकलने वाले हानिकारक कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, जो कि आंशिक रूप से सच भी है. लेकिन वैज्ञानिक समुदाय का कहना है कि हमें सिर्फ गाड़ी के साइलेंसर से निकलने वाले धुएं को नहीं देखना चाहिए.

हमें पूरी प्रक्रिया का मूल्यांकन 'वेल-टू-व्हील' (कुएं से लेकर पहिए तक) के आधार पर करना होगा. यानी गन्ना उगाने, उसकी सिंचाई करने, रासायनिक खाद डालने, फसल को चीनी मिलों तक ढोने और फिर डिस्टिलरी में एथेनॉल तैयार करने में जो भारी मात्रा में बिजली, डीजल और कोयला जलता है, उसका कुल कार्बन फुटप्रिंट भी जोड़ा जाना चाहिए. खुद नीति आयोग की 2021 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पारंपरिक ईंधन के मुकाबले E20 का कुल ग्रीनहाउस गैस (GHG) फायदा सिर्फ 18% के आसपास ही बैठता है, न कि 50% जैसा कि अक्सर विज्ञापनों में प्रचारित किया जाता है.

5. वैश्विक विकल्प और टिकाऊ तरक्की का रास्ता

जर्मनी और कई यूरोपीय मुल्कों ने जब अपने यहाँ एथेनॉल मिश्रित ईंधन को लॉन्च किया, तो उन्होंने आम उपभोक्ताओं से उनके चुनाव का हक नहीं छीना. वहाँ आज भी पुरानी और नई गाड़ियों की आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग फ्यूल डिस्पेंसर (विकल्प) पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध हैं. भारत में भी अगर संक्रमण काल (Transition Period) के दौरान E20 के साथ-साथ कम मिश्रण वाला ईंधन (जैसे E10 या शुद्ध पेट्रोल) पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे, तो जनता बेबस महसूस नहीं करेगी.

दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आज सिर्फ एथेनॉल पर निर्भर नहीं हैं. वे इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), ग्रीन हाइड्रोजन, मजबूत सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों और सेकंड जनरेशन (2G) बायोफ्यूल (जो फसल के बचे हुए कचरे या पराली से बनता है) पर तेजी से काम कर रही हैं. किसी भी एक तकनीक को अंतिम और इकलौता हल मान लेना दूरअंदेशी नहीं है.

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