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FATF के डर से खेल आतंकियों पर कार्रवाई नहीं, पाकिस्तान को अब लॉबिंग का सहारा

News India Live, Digital Desk : कहते हैं न कि आदतें इतनी आसानी से नहीं बदलतीं, और हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के साथ तो यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। अभी हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो कुछ हुआ, उसने एक बार फिर आतंकवाद का घिनौना चेहरा दिखाया। उम्मीद तो यह की जाती है कि ऐसे हमलों के बाद कोई भी देश अपनी गलतियों को सुधारेगा, आतंकियों पर नकेल कसने के लिए सख्त कदम उठाएगा। लेकिन, पाकिस्तान की कहानी थोड़ी अलग और पुरानी ही है।कार्रवाई नहीं, ‘जुगाड़’ पर भरोसाखबरें आ रही हैं कि अपनी सरजमीं पर पल रहे आतंक को खत्म करने के बजाय, पाकिस्तान अपनी ‘अंतरराष्ट्रीय इमेज’ को ठीक करने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है। पहलगाम हमले के बाद उसे यह डर सताने लगा है कि कहीं दुनिया की नज़रें फिर से उस पर टेढ़ी न हो जाएं। खास तौर पर एफएटीएफ (FATF) की ‘ग्रे लिस्ट’ का डर उसे सोने नहीं दे रहा।अब आप सोचेंगे कि वो कर क्या रहा है? तो जवाब है—’लॉबिंग’।आसान शब्दों में कहें तो, अपनी गलतियों को सुधारने की जगह पाकिस्तान दुनिया के बड़े-बड़े देशों और संस्थाओं को यह मनाने में पैसा और वक्त खर्च कर रहा है कि “देखिए, हम तो बहुत अच्छे हैं, हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं।” यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे घर में कूड़ा पड़ा हो, और उसे साफ करने की बजाय कालीन के नीचे छिपा दिया जाए ताकि मेहमानों को सब साफ दिखे।ग्रे लिस्ट से बचने की जद्दोजहदपाकिस्तान को यह अच्छे से पता है कि अगर वह दोबारा एफएटीएफ की रडार पर आ गया या ग्रे लिस्ट में फंस गया, तो उसकी डूबती हुई अर्थव्यवस्था के लिए यह आखिरी कील साबित होगी। इसीलिए, जैश और लश्कर जैसे संगठनों पर ठोस कार्रवाई करने के बजाय, वह लॉबिंग फर्म्स और पीआर एजेंसियों के जरिए यह माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है कि उसने बहुत सुधार कर लिया है।असलियत कब तक छिपेगी?लेकिन, सच्चाई यह है कि जुबानी जमा-खर्च और असल एक्शन में बहुत फर्क होता है। भारत हमेशा से सबूतों के साथ दुनिया को बताता रहा है कि आतंक की जड़ें कहाँ हैं। पाकिस्तान का यह ‘लॉबिंग’ वाला रास्ता उसे कुछ समय के लिए भले ही राहत दे दे, लेकिन जब तक आतंकवाद की फैक्ट्रियां बंद नहीं होंगी, न तो वहां शांति आएगी और न ही दुनिया उन पर भरोसा करेगी।कुल मिलाकर, पाकिस्तान ने फिर वही किया जिसकी आशंका थी—बीमारी का इलाज करने की बजाय, बीमारी को छिपाने की कोशिश। अब देखना यह है कि दुनिया इस ‘दिखावे’ को कब तक सच मानती है।

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