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FCRA Amendment Bill: एफसीआरए पर आज से संसद में मचेगा घमासान! जेपीसी की पहली हाई-लेवल बैठक, 31 सांसदों को बिल की बारीकियां समझाएंगे टॉप अफसर!

देश के गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं और शैक्षणिक संस्थानों में विदेश से आने वाले चंदे के नियमों को और अधिक कड़ा व पारदर्शी बनाने के मकसद से लाए गए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक को लेकर संसद का गलियारा आज से पूरी तरह गरमाने वाला है। इस बहुचर्चित और संवेदनशील विधेयक पर गठित 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी (Joint Parliamentary Committee) की पहली औपचारिक बैठक आज राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में संसद भवन एनेक्सी में आयोजित की जा रही है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के प्रमुख सांसदों की मौजूदगी वाली इस जेपीसी की पहली बैठक से ही तीखी बहसों और सवाल-जवाब के दौर की शुरुआत होने के पूरे आसार हैं। विदेशी फंडिंग के राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर और संस्थाओं की स्वायत्तता के बीच संतुलन साधने के इस नए कानूनी मसौदे पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।

31 सांसदों का संयुक्त पैनल: लोकसभा और राज्यसभा का प्रतिनिधित्व

संसद द्वारा गठित इस विशेष संयुक्त संसदीय समिति का ढांचा दोनों सदनों के संतुलन को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। समिति में कुल 31 सांसदों को शामिल किया गया है, जिनमें से 21 सदस्य लोकसभा से और 10 सदस्य राज्यसभा से नामित किए गए हैं। इस समिति में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ-साथ विपक्षी दलों जैसे कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और सपा के वरिष्ठ व विधि मामलों के जानकार सांसद शामिल हैं। जेपीसी की कमान संभाल रहे समिति के अध्यक्ष की अध्यक्षता में यह बैठक सुबह निर्धारित समय पर शुरू होगी, जिसमें विधेयक के एक-एक क्लॉज, उपबंध और प्रस्तावित बदलावों पर विधिवत चर्चा की कार्यसूची तय की जाएगी।

गृह मंत्रालय के आला अफसरों की अहम भूमिका: क्लाउज-बाय-क्लाउज ब्रीफिंग

आज की इस शुरुआती बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के शीर्ष प्रशासनिक और कानूनी अधिकारियों द्वारा दिया जाने वाला विस्तृत प्रेजेंटेशन होगा। गृह सचिव, विदेशी प्रभाग (Foreigners Division) के संयुक्त सचिव और गृह मंत्रालय के कानूनी सलाहकार जेपीसी के सभी 31 सांसदों के समक्ष उपस्थित होकर विधेयक के मूल उद्देश्यों और इसमें किए गए बदलावों की आवश्यकता का पूरा खाका पेश करेंगे।

अधिकारी सांसदों को यह समझाएंगे कि मौजूदा एफसीआरए कानून में कौन-कौन सी कमियां या कानूनी खामियां (Loop-holes) थीं, जिनका दुरुपयोग करके कुछ गैर-सरकारी संगठन राष्ट्रीय हितों के विपरीत या बिना समुचित ऑडिट के विदेशी धन खपा रहे थे। इसके अलावा गृह मंत्रालय यह भी स्पष्ट करेगा कि नए संशोधन किस प्रकार पारदर्शी ट्रैकिंग, बैंकों के साथ रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग की तुरंत पहचान करने में सुरक्षा एजेंसियों को सक्षम बनाएंगे।

एफसीआरए संशोधन के प्रमुख बिंदु: किन नियमों पर बढ़ेगी सख्ती?

विधेयक के जिन मुख्य प्रावधानों को लेकर चर्चा गर्म है, उनमें विदेशी चंदे की प्राप्ति, उसके खर्च की सीमा और प्रशासनिक व्यय के कड़े नियम शामिल हैं। पूर्व के संशोधनों में जहां प्रशासनिक खर्च की अधिकतम सीमा को 20 प्रतिशत तक सीमित किया गया था, वहीं नए मसौदे में धन के अंतिम उपयोग (End-use) की ऑडिटिंग और भी सख्त करने का प्रस्ताव है।

इसके साथ ही, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की नई दिल्ली मुख्य शाखा में ही प्राथमिक एफसीआरए खाता खोलने की अनिवार्यता के बाद अब सब-अकाउंट्स और जिला स्तरीय संचालन पर भी कड़ी डिजिटल निगरानी का तंत्र विकसित करने का प्रस्ताव है। नए नियमों के तहत यदि किसी एनजीओ के खिलाफ देश विरोधी गतिविधियों, धर्मांतरण या सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए विदेशी धन के इस्तेमाल की प्राथमिक शिकायत मिलती है, तो सरकार के पास उसका एफसीआरए लाइसेंस त्वरित रूप से निलंबित या रद्द करने के अधिकार और अधिक प्रभावी हो जाएंगे।

विपक्ष के तीखे सवाल: एनजीओ की स्वायत्तता बनाम सरकारी नियंत्रण का टकराव

जेपीसी की इस पहली ही बैठक में विपक्षी दलों के सांसदों ने सरकार और गृह मंत्रालय के अधिकारियों को घेरने की पूरी रणनीति बना ली है। विपक्षी सदस्यों का तर्क है कि कानून में अत्यधिक सख्ती के नाम पर सामाजिक, स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में ईमानदारी से काम करने वाले निष्पक्ष एनजीओ का गला घोंटा जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि नियमों की आड़ में सरकार अपनी आलोचना करने वाले संगठनों को डराने और उनके विदेशी अनुदान को रोकने का प्रयास कर रही है। सांसदों द्वारा अफसरों से यह सवाल पूछे जाने की पूरी संभावना है कि पिछले कुछ वर्षों में रद्द किए गए लाइसेंसों में से कितने मामलों में ठोस साक्ष्य मिले और नए नियमों से ग्रामीण भारत में सेवा कार्य कर रही वैध संस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

आगे की रूपरेखा: विशेषज्ञों, हितधारकों और जनता से ली जा सकती है राय

संसदीय परंपरा के अनुसार, जेपीसी केवल सरकारी अधिकारियों की ब्रीफिंग तक सीमित नहीं रहेगी। आज की बैठक में कार्यप्रणाली और प्राथमिक एजेंडा तय होने के बाद समिति आने वाले दिनों में देश के प्रमुख कानूनी विशेषज्ञों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बड़े एनजीओ के प्रतिनिधियों, वित्तीय विश्लेषकों और आम जनता से भी सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित करने का फैसला ले सकती है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने और मसौदे के हर शब्द की समीक्षा के बाद जेपीसी अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसे आगामी संसदीय सत्र में संसद के दोनों सदनों के पटल पर पेश किया जाएगा।

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