FII vs DII: विदेशी निवेशक बेचते रहे, घरेलू निवेशकों ने संभाला, अब किसके हाथ में है भारतीय शेयर बाजार

भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों एक दिलचस्प शह और मात का खेल चल रहा है। एक तरफ जहां विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय बाजारों से अपना पैसा निकालने में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने बाजार को गिरने से बचाने के लिए ढाल तैयार कर ली है। दलाल स्ट्रीट पर चल रही इस खींचतान ने हर छोटे-बड़े निवेशक के मन में यह सवाल पैदा कर दिया है कि आखिर भारतीय शेयर बाजार की कमान अब किसके हाथों में है?
विदेशी निवेशकों की बेरुखी और भारतीय बाजार का यू-टर्न
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारतीय शेयर बाजार की दिशा काफी हद तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI/FII) के मूड पर निर्भर करती थी। जब भी वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल होती या अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बदलाव का संकेत देता, FII तेजी से भारतीय बाजार से पैसा खींच लेते थे, जिससे बाजार ताश के पत्तों की तरह ढह जाता था। हाल के महीनों में भी FII ने रिकॉर्ड बिकवाली की है। भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरें और भारतीय शेयरों का महंगा वैल्यूएशन इसके मुख्य कारण रहे हैं। लेकिन इस बार कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आया है—FII की इस भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार क्रैश नहीं हुआ, बल्कि इसने नए रिकॉर्ड बनाए हैं।
घरेलू निवेशकों (DII) की ताकत: म्यूचुअल फंड और SIP का चक्रव्यूह
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा हाथ हमारे अपने घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) और देश के खुदरा (Retail) निवेशकों का है। आज भारत का आम नागरिक शेयर बाजार को लेकर जागरूक हो चुका है। सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए हर महीने म्यूचुअल फंड में हजारों करोड़ रुपये का निवेश आ रहा है। इस घरेलू लिक्विडिटी (नकदी प्रवाह) के दम पर DII हर उस शेयर को लपक रहे हैं, जिसे विदेशी निवेशक बेचकर भाग रहे हैं। डोमेस्टिक फंड्स, इंश्योरेंस कंपनियों और पेंशन फंड्स ने मिलकर बाजार के नीचे एक मजबूत फ्लोर बना दिया है, जिसने FII के दबदबे को पूरी तरह से चुनौती दी है।
अब किसके हाथ में है दलाल स्ट्रीट का रिमोट कंट्रोल?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय शेयर बाजार में अब एक बड़ा ढांचागत बदलाव (Structural Shift) आ चुका है। पहले जहां बाजार का रिमोट कंट्रोल विदेशी फंड्स के हाथ में होता था, वहीं अब इसकी चाबी काफी हद तक घरेलू निवेशकों के पास आ गई है। इसे आप भारतीय शेयर बाजार का "आत्मनिर्भर" होना भी कह सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि FII की अहमियत खत्म हो गई है। जब भी बाजार में बड़ी तेजी (Bull Run) आनी होती है, तो FII का सपोर्ट बेहद जरूरी हो जाता है। लेकिन हां, अब FII बाजार को अपनी उंगलियों पर नचा नहीं सकते। आज का भारतीय बाजार दोनों ताकतों के बीच एक संतुलित तालमेल पर चल रहा है, जहां DII एक मजबूत सुरक्षा कवच की भूमिका निभा रहे हैं।