G-20 सम्मेलन में भारत की दोटूक और सख्त कूटनीति: अमेरिका के दबाव के बावजूद दो टूक कहा

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक व्यापारिक मंचों पर भारत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक संप्रभुता के मामलों में किसी भी महाशक्ति के दबाव में झुकने वाला नहीं है। हाल ही में आयोजित G-20 की उच्च स्तरीय बैठकों और सम्मेलनों के दौरान अमेरिका और कुछ अन्य विकसित देशों द्वारा वैश्विक व्यापार समझौतों तथा नियमों में बदलाव को लेकर एक बड़ा मुद्दा उठाया गया था, जिस पर भारत ने अपनी स्थिति बेहद स्पष्ट और दोटूक शब्दों में दुनिया के सामने रख दी है। भारत के शीर्ष प्रतिनिधियों ने वैश्विक मंच पर यह साफ कर दिया है कि दुनिया भर में होने वाला आपसी व्यापार और आर्थिक लेन-देन किसी एक देश की इच्छा या द्विपक्षीय दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत विश्व व्यापार संगठन (WTO) के स्थापित नियमों और बहुपक्षीय समझौतों के तहत ही संचालित होना चाहिए। भारत का यह कड़ा और संतुलित रुख ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई बड़े देश अपनी घरेलू अर्थव्यवस्थाओं को सुरक्षित करने के लिए संरक्षणवादी नीतियों का सहारा ले रहे हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के इस मजबूत स्टैंड ने विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने में एक बार फिर से अग्रणी भूमिका निभाई है और यह बता दिया है कि वैश्विक आर्थिक秩序 को बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करना सभी देशों के लिए अनिवार्य होना चाहिए।
अमेरिका द्वारा उठाया गया व्यापारिक मुद्दा और दुनिया के बड़े देशों के बीच छिपी खींचतान
G-20 मंच पर अमेरिका और उसके कुछ पश्चिमी सहयोगियों ने हाल के वर्षों में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का हवाला देते हुए वैश्विक व्यापार प्रणाली में कुछ ऐसे बदलावों की वकालत की थी, जो अक्सर विकासशील देशों के लिए प्रतिकूल साबित हो सकते हैं। अमेरिका का यह तर्क था कि पारंपरिक डब्ल्यूटीओ (WTO) के नियम आज के आधुनिक डिजिटल और तकनीकी युग की जरूरतों को पूरी तरह से पूरा करने में कई बार धीमे साबित होते हैं, इसलिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं या कड़े प्रावधानों पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन भारत ने इस वैचारिक प्रस्ताव पर तीखी आपत्ति जताते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी भी बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास दुनिया भर के गरीब और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। भारत ने जोर देकर कहा कि यदि वैश्विक व्यापार के नियमों को चुनिंदा देशों की मर्जी के अनुसार बदला जाने लगा, तो मुक्त और निष्पक्ष व्यापार का वह मूल ढांचा ही ढह जाएगा जिस पर वैश्विक शांति और आर्थिक समृद्धि टिकी हुई है। अमेरिका और अन्य विकसित देशों द्वारा उठाए गए इस संवेदनशील मुद्दे पर भारत की यह स्पष्टवादिता अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गई है, क्योंकि यह भारत की बढ़ती हुई आर्थिक ताकत और राजनीतिक दृढ़ता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) की प्रासंगिकता और भारत का बहुपक्षीय व्यापार पर अटूट भरोसा
विश्व व्यापार संगठन (WTO) वैश्विक व्यापार के नियमों को तय करने वाला वह प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थान है जो दुनिया भर के देशों के बीच विवादों के निपटारे और निष्पक्ष व्यापारिक माहौल को सुनिश्चित करने का काम करता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से डब्ल्यूटीओ की कार्यप्रणाली और उसकी विवाद निपटान प्रणाली (Dispute Settlement Mechanism) को लेकर दुनिया भर में बहस छिड़ी हुई है, क्योंकि कई विकसित देश इसके नियमों को दरकिनार करके अपनी मनमानी करने की कोशिश करते हैं। ऐसे दौर में भारत ने डब्ल्यूटीओ के नियमों के प्रति अपनी निष्ठा और अटूट विश्वास को दोहराते हुए यह साबित कर दिया है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को मजबूत रखने के लिए इस संस्था का मजबूत बने रहना बेहद जरूरी है। भारत ने जी-20 के मंच से यह कड़ा संदेश दिया कि कृषि सब्सिडी, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल ट्रेड और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर यदि कोई भी निर्णय लिया जाना है, तो वह केवल डब्ल्यूटीओ के सर्वसम्मति वाले दायरे में ही होना चाहिए, न कि कुछ चुनिंदा देशों के बंद कमरों में तय किए गए समझौतों के जरिए। भारत का यह रुख उन करोड़ों किसानों और छोटे उद्योगों के हितों की रक्षा करता है जो वैश्विक बाजार की प्रतिस्पर्धा में सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं।
भारत की मजबूत आर्थिक कूटनीति और वैश्विक दक्षिण (Global South) का नेतृत्व
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और मजबूत आर्थिक सुधारों के दम पर वैश्विक मंचों पर एक ऐसा स्थान बना लिया है जहां उसकी बात को पूरी दुनिया बहुत ही गंभीरता से सुनती है। G-20 जैसे प्रतिष्ठित मंच पर अमेरिका जैसी महाशक्ति के सामने दोटूक अंदाज में यह कहना कि व्यापार केवल अंतरराष्ट्रीय नियमों से चलेगा, इस बात का गवाह है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में केवल एक दर्शक नहीं बल्कि खेल के नियमों को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है। भारत लगातार अफ्रीकी देशों, लैटिन अमेरिका और एशिया के विकासशील देशों यानी 'ग्लोबल साउथ' की उन समस्याओं को प्रमुखता से उठाता रहा है जिन्हें अक्सर विकसित देश नजरअंदाज कर देते हैं। जब भारत ने डब्ल्यूटीओ के नियमों की वकालत की, तो उसे कई अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समर्थन मिला, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की यह कूटनीतिक लाइन केवल उसकी अपनी नहीं बल्कि दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से की आवाज है। यह नेतृत्व भारत की बढ़ती हुई साख और उसकी उस कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है जो राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ वैश्विक संतुलन को भी साधने में पूरी तरह सक्षम है।
भविष्य के वैश्विक व्यापारिक रिश्ते और इस दोटूक बयान के दूरगामी भू-राजनीतिक परिणाम
जी-20 सम्मेलन में भारत द्वारा दिए गए इस कड़े और स्पष्ट संदेश के आने वाले समय में वैश्विक व्यापार समझौतों और द्विपक्षीय वार्ताओं पर बहुत गहरे प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है। अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक और रक्षा संबंध भले ही कितने ही गहरे क्यों न हों, लेकिन आर्थिक और व्यापारिक मोर्चे पर भारत ने यह रेखा खींच दी है कि राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। आने वाले दिनों में जब भी डब्ल्यूटीओ के मंत्री-स्तरीय सम्मेलन या अन्य वैश्विक व्यापारिक बैठकें होंगी, तो भारत का यह रुख एक मजबूत मिसाल के रूप में सामने आएगा और अन्य विकासशील देशों को भी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा देगा। यह घटना इस बात का सटीक उदाहरण है कि आधुनिक कूटनीति में दबाव की राजनीति के आगे टिकने के बजाय अपने तर्कों, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और सामूहिक शक्ति के आधार पर कैसे अपनी बात को मनवाया जाता है। भारत की यह दोटूक नीति न केवल देश के भीतर एक मजबूत संदेश देती है, बल्कि पूरी दुनिया को यह बताती है कि एक आत्मनिर्भर और आश्वस्त भारत अपने भविष्य के फैसले खुद लेने की पूरी ताकत रखता है।