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India China Relations : क्या गलवान की कड़वाहट भूल फिर भारत आएंगे शी जिनपिंग? ब्रिक्स सम्मेलन बना दोस्ती का नया बहाना

News India Live, Digital Desk: साल 2020 में गलवान घाटी की उस खूनी झड़प ने भारत और चीन के रिश्तों पर जो बर्फ जमा दी थी, अब वह धीरे-धीरे पिघलती नजर आ रही है। कूटनीतिक गलियारों से छनकर आ रही खबरों की मानें तो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस साल भारत की मेजबानी में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में शिरकत करने दिल्ली आ सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो चार साल के लंबे अंतराल और सीमा पर चले तनाव के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी।ब्रिक्स की आड़ में रिश्तों को पटरी पर लाने की कवायद जानकारों का मानना है कि सीधे तौर पर बातचीत शुरू करना दोनों देशों के लिए राजनीतिक रूप से थोड़ा पेचीदा है, लेकिन ‘ब्रिक्स’ जैसा अंतरराष्ट्रीय मंच इसमें एक ढाल का काम कर रहा है। हाल ही में दोनों देशों के आला अधिकारियों के बीच हुई बैठकों ने इस दौरे की जमीन तैयार कर दी है। चीन ने न केवल भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का खुले दिल से समर्थन किया है, बल्कि पश्चिम एशिया (Middle East) जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी भारत के साथ सुर में सुर मिलाया है।चीनी दूत का दिल्ली दौरा और नरमी के संकेत पिछले दिनों चीन के विशेष दूत झाई जुन नई दिल्ली में थे। उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय की सचिव नीना मल्होत्रा से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद जो सुर उभरे, वे सकारात्मक थे। झाई जुन ने साफ कहा कि चीन भारत की भूमिका का सम्मान करता है। वहीं, भारत की ओर से भी यह संकेत दिया गया कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए हम ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं।कैसे पिघली कड़वाहट की बर्फ? यह कूटनीतिक बदलाव रातों-रात नहीं हुआ है। इसके पीछे पिछले कुछ महीनों की बड़ी कड़ियाँ जुड़ी हैं:एलएसी पेट्रोलिंग समझौता: अक्टूबर 2024 में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त को लेकर जो सहमति बनी, उसने सबसे पहले तनाव कम किया।रूस में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात: कजान में ब्रिक्स समिट के दौरान दोनों नेताओं ने औपचारिक बातचीत की थी, जिसने रिश्तों में जमी बर्फ को तोड़ दिया।पीएम मोदी का न्योता: 2025 में जब पीएम मोदी एससीओ बैठक के लिए चीन गए थे, तब उन्होंने जिनपिंग को भारत आने का निमंत्रण दिया था।चीन के लिए भारत क्यों है जरूरी? चीन की सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापारिक चुनौतियों के बीच उसे भारत जैसे विशाल बाजार की सख्त जरूरत है। दूसरी ओर, भारत भी अपनी सीमाओं पर शांति चाहता है ताकि वह अपने आर्थिक विकास की गति को और तेज कर सके। ऐसे में शी जिनपिंग का यह संभावित दौरा न केवल द्विपक्षीय रिश्तों बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए भी गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

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