ISRO ने गगनयान के लिए CE-20 क्रायोजेनिक इंजन का किया अंतिम महा-परीक्षण, पहली बार हुआ NPS तकनीक का इस्तेमाल

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने पहले मानव अंतरिक्ष मिशन 'गगनयान' और आगामी भारी उपग्रह अभियानों की दिशा में एक और ऐतिहासिक तथा अभूतपूर्व मील का पत्थर हासिल कर लिया है। इसरो ने देश के सबसे शक्तिशाली और भारी लॉन्च व्हीकल, एलवीएम-3 (LVM-3) के सातवें परिचालन मिशन के लिए तय किए गए 'CE-20 क्रायोजेनिक इंजन' का अंतिम उड़ान स्वीकृति परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न कर लिया है। तमिलनाडु के महेंद्रगिरि में स्थित इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स (IPRC) में किए गए इस बेहद जटिल परीक्षण के तहत, इंजन को अंतरिक्ष में भेजने से पहले हूबहू वास्तविक और विपरीत परिस्थितियों में संचालित कर उसकी मारक क्षमता व विश्वसनीयता को परखा गया है।
सबसे शक्तिशाली रॉकेट का 'दिल': 22 टन की ताकत से उड़ान भरेगा CE-20 इंजन
अतीत में 'GSLV Mk-3' के नाम से अपनी धाक जमाने वाला 'LVM-3' वर्तमान में इसरो का सबसे भरोसेमंद, भारी और विशालकाय रॉकेट है। इस शक्तिशाली प्रक्षेपण यान के सबसे ऊपरी और अंतिम चरण (Upper Stage) को अंतरिक्ष की कक्षा में धकेलने का मुख्य जिम्मा इसी 'CE-20 क्रायोजेनिक इंजन' पर होता है।
इसरो द्वारा जारी आधिकारिक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, यह अत्याधुनिक इंजन 19 टन से लेकर 22 टन तक के प्रचंड थ्रस्ट (रॉकेट को आगे बढ़ाने वाली जबरदस्त शक्ति) पर काम करने के लिए पूरी तरह से प्रमाणित और सुरक्षित पाया गया है। आपको बता दें कि यह इंजन पहले ही चंद्रयान-2, ऐतिहासिक चंद्रयान-3 और तीन बड़े अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक उपग्रह अभियानों सहित लगातार आठ सफल मिशनों में अपनी श्रेष्ठता साबित कर चुका है।
गगनयान के लिए मिली हरी झंडी: मानव मिशन के कड़े मानकों पर उतरा खरा
इस हालिया परीक्षण की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसे पूर्णतः 22 टन के अधिकतम थ्रस्ट पर संचालित किया गया। इसरो के वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन (Human Spaceflight Mission) के लिए आवश्यक सभी कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल, क्रू सेफ्टी और तकनीकी विश्वसनीयता के पैमानों को इस इंजन ने सफलतापूर्वक पार कर लिया है।
इसका सीधा मतलब यह है कि जब भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को गगनयान मॉड्यूल के जरिए अंतरिक्ष में भेजेगा, तब रॉकेट की मुख्य रीढ़ यही स्वदेशी CE-20 क्रायोजेनिक इंजन बनने के लिए पूरी तरह तैयार होगा।
क्या है ग्राउंड-ब्रेकिंग 'NPS' तकनीक जो दुनिया में पहली बार आई सामने
इस अंतिम उड़ान परीक्षण के दौरान भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने पहली बार एक क्रांतिकारी तकनीक, 'नोजल सुरक्षा प्रणाली' (Nozzle Protection System – NPS) का सफलतापूर्वक उपयोग किया। रॉकेट इंजन का नोजल वह अंतिम छोर होता है, जिससे होकर अत्यधिक गर्म, संपीड़ित और बेहद तेज गति वाली गैसें बाहर निकलती हैं, जिससे रॉकेट को आगे बढ़ने की ऊर्जा मिलती है। परीक्षण के दौरान इस हिस्से पर अत्यधिक दबाव और तापमान होता है, जो इसे क्षतिग्रस्त कर सकता है।
यह नई एनपीएस (NPS) तकनीक परीक्षण के दौरान नोजल को थर्मल और स्ट्रक्चरल नुकसान से पूरी तरह सुरक्षित रखती है। यह प्रणाली विशेष रूप से पृथ्वी की सतह पर ही 'उच्च ऊंचाई' (High Altitude Condition) जैसी हवा विहीन और बेहद कम दबाव वाली अंतरिक्षीय परिस्थितियों को कृत्रिम रूप से पैदा कर जटिल परीक्षणों को बेहद सरल बना देती है। इसकी मदद से इसरो अब बेहद सीमित संसाधनों और कम लागत में लंबे समय तक चलने वाले इंजन परीक्षणों को आसानी से अंजाम दे सकेगा।
'सॉल्व' (SOLVE) सॉलिड मोटर का भी सफल धमाका: सुरक्षित लौटेगा क्रू मॉड्यूल
इसरो की यह कामयाबी केवल क्रायोजेनिक इंजन तक ही सीमित नहीं है। गगनयान मिशन को 100 प्रतिशत सुरक्षित बनाने के लिए हाल ही में इसरो ने 'सॉल्व' (Sub-Orbital Launch Vehicle for Experiments) के ठोस ईंधन वाले शक्तिशाली रॉकेट मोटर का भी पहला सफल जमीनी परीक्षण किया है।
इस विशिष्ट सॉलिड मोटर परीक्षण का मुख्य वैज्ञानिक उद्देश्य अंतरिक्ष में किसी भी आपातकालीन स्थिति के दौरान या मिशन पूरा होने के बाद हमारे अंतरिक्ष यात्रियों वाले 'क्रू मॉड्यूल' को सुरक्षित रूप से धरती के वायुमंडल में वापस लाना और उसकी सटीक लैंडिंग की जांच करना है। इन लगातार मिल रही सफलताओं ने साबित कर दिया है कि भारत का गगनयान मिशन अब अंतरिक्ष में तिरंगा लहराने से बस कुछ ही कदम दूर है।