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JEE Advanced: बिना सहमति के मिल गई IIT सीट तो हो जाएंगे अयोग्य जोसा JoSAA के इस नियम ने छात्र की मेहनत पर फेरा पानी

News India Live, Digital Desk: देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक JEE Advanced को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक मेधावी छात्र की सालों की मेहनत उस वक्त दांव पर लग गई, जब उसे उसकी मर्जी के बिना ही IIT की सीट अलॉट कर दी गई और बाद में उसे आगामी परीक्षा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। जोसा (JoSAA) के काउंसलिंग नियमों की पेचीदगियों में फंसे इस छात्र ने अब न्याय के लिए देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले ने उन हजारों अभ्यर्थियों की चिंता बढ़ा दी है जो हर साल IIT में प्रवेश का सपना देखते हैं।क्या है पूरा विवाद? छात्र को क्यों ठहराया गया अयोग्य?पूरा मामला काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान ‘सहमति’ (Consent) और सीट अलॉटमेंट के तकनीकी नियमों से जुड़ा है। दरअसल, JoSAA के कड़े नियमों के अनुसार, यदि किसी छात्र को एक बार IIT की सीट आवंटित कर दी जाती है और वह उसे स्वीकार कर लेता है या प्रक्रिया के दौरान कुछ तकनीकी कदम पूरे हो जाते हैं, तो वह अगले साल फिर से JEE Advanced देने के लिए पात्र नहीं रहता। इस मामले में छात्र का तर्क है कि उसे उसकी जानकारी या स्पष्ट लिखित सहमति के बिना ही सीट आवंटित कर दी गई थी, जिसके कारण सिस्टम ने उसे अब दोबारा परीक्षा में बैठने से रोक दिया है।सुप्रीम कोर्ट ने IIT मद्रास और जोसा से मांगा जवाबछात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत ने JoSAA (Joint Seat Allocation Authority) और इस वर्ष की परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था IIT मद्रास को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। न्यायमूर्ति ने पूछा है कि क्या ऐसी कोई तकनीकी व्यवस्था है जहाँ छात्र की सक्रिय सहमति के बिना सीट अलॉटमेंट को अंतिम मान लिया जाता है? अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि एक मेधावी छात्र का भविष्य केवल नियमों की जटिल व्याख्या के कारण बर्बाद नहीं होना चाहिए।IIT प्रवेश के कड़े नियम और छात्रों की मजबूरीIIT में प्रवेश के लिए जोसा के नियम काफी सख्त हैं। ‘वन-टाइम सीट अलॉटमेंट’ पॉलिसी के तहत, यदि किसी छात्र ने एक बार IIT में दाखिला ले लिया या उसकी सीट कन्फर्म हो गई, तो वह भविष्य में दोबारा इस परीक्षा में नहीं बैठ सकता। यह नियम इसलिए बनाया गया था ताकि सीटों की बर्बादी न हो और वेटिंग लिस्ट वाले छात्रों को मौका मिले। हालांकि, इस छात्र का दावा है कि उसने अपनी आवंटित सीट का कभी उपयोग ही नहीं किया, इसलिए उसे ‘अयोग्य’ (Ineligible) घोषित करना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है।हजारों अभ्यर्थियों के लिए सबक और भविष्य की राहयह कानूनी लड़ाई उन सभी इंजीनियरिंग उम्मीदवारों के लिए एक बड़ा सबक है जो काउंसलिंग प्रक्रिया में भाग लेते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि JoSAA पोर्टल पर विकल्पों को लॉक करते समय और ‘फ्रीज’, ‘फ्लोट’ या ‘स्लाइड’ जैसे विकल्पों का चुनाव करते समय छात्र को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं। यदि अदालत छात्र के पक्ष में फैसला देती है, तो यह उन तमाम छात्रों के लिए एक बड़ी मिसाल होगी जो तकनीकी खामियों के कारण अपने करियर को संकट में महसूस करते हैं।

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