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Judicial Service Rules: तीन साल की जगह अब सिर्फ एक साल की वकालत; जज बनने के नियमों में क्या हुआ बड़ा बदलाव?

न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे देश भर के लाखों लॉ ग्रेजुएट्स के लिए पात्रता नियमों (Eligibility Criteria) को लेकर एक बड़ा और राहत भरा अपडेट सामने आया है। सिविल जज (जूनियर डिविजन) यानी पीसीएस-जे (PCS-J) परीक्षा में शामिल होने के लिए अनिवार्य वकालत अनुभव की जो शर्त 3 साल करने की चर्चा में थी, उसमें संशोधन करते हुए अब इसे घटाकर केवल 1 वर्ष करने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया है। इस कदम से कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले नए वकीलों को करियर के शुरुआती दौर में ही न्यायिक सेवा में आने का त्वरित अवसर मिलेगा।

पहले क्या था नियम और क्या था 3 साल का विवाद?

पूर्व में विभिन्न राज्यों की न्यायिक सेवा परीक्षाओं में लॉ की डिग्री (LLB) पूरी करते ही फ्रेश ग्रेजुएट्स को सीधे सिविल जज परीक्षा में बैठने की अनुमति थी। हालांकि, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा यह तर्क दिया गया था कि बिना जमीनी कोर्ट प्रैक्टिस के युवा जजों को व्यावहारिक अदालती प्रक्रियाओं और मुकदमों की बारीकियों को समझने में कठिनाई होती है।

इसके बाद पात्रता में न्यूनतम 3 साल के कोर्ट प्रैक्टिस (वकालत के अनुभव) को अनिवार्य करने की सिफारिश की गई थी। लेकिन इस प्रस्ताव का युवा लॉ ग्रेजुएट्स और छात्र संगठनों ने कड़ा विरोध किया। छात्रों का कहना था कि 5 वर्षीय लॉ कोर्स और फिर 3 साल की अनिवार्य वकालत से उनकी उम्र 27-28 वर्ष तक पहुंच जाएगी, जिससे करियर का कीमती समय केवल अनुभव जुटाने में निकल जाएगा।

1 साल की वकालत के अनुभव का क्या है नया फॉर्मूला?

सभी पक्षों, बार एसोसिएशनों और विधिक विशेषज्ञों के सुझावों के बाद अब एक संतुलित रास्ता निकाला गया है। नए प्रारूप के अनुसार, अभ्यर्थियों के लिए 3 साल की लंबी अवधि के बजाय केवल 1 वर्ष की सक्रिय अदालती वकालत (Active Court Practice) को मानक बनाया जा रहा है।

इस 1 साल के अनुभव के तहत अभ्यर्थी को किसी मान्यता प्राप्त बार काउंसिल में इनरोल होकर किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के अधीन या स्वतंत्र रूप से मामलों में पैरवी करने का औपचारिक प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना होगा। इससे उम्मीदवारों को बुनियादी अदालती कामकाज का व्यवहारिक अनुभव भी मिल जाएगा और उनका बहुमूल्य समय भी बर्बाद नहीं होगा।

अकादमिक रूप से उत्कृष्ट (Meritorious) छात्रों को क्या मिलेगी छूट?

नए नियमों के मसौदे में उन मेधावी छात्रों के लिए भी विशेष प्रावधान पर विचार किया गया है जिन्होंने अपनी 3 वर्षीय या 5 वर्षीय एलएलबी की डिग्री में उत्कृष्ट प्रदर्शन (जैसे 70% या उससे अधिक अंक और बिना किसी बैक/एटीकेटी के प्रथम प्रयास में डिग्री) किया हो।

कुछ राज्यों में ऐसे टॉपर्स और उत्कृष्ट अकादमिक रिकॉर्ड वाले छात्रों को बिना किसी अनिवार्य वकालत अनुभव के भी सीधे पीसीएस-जे परीक्षा में शामिल होने का विकल्प देने पर विचार किया जा रहा है, ताकि प्रतिभाशाली युवाओं को सीधे न्यायपालिका से जोड़ा जा सके।

जज बनने की तैयारी कर रहे छात्रों पर क्या होगा इसका असर?

  • तैयारी और अनुभव का संतुलन: छात्रों को अब लॉ पूरा करने के तुरंत बाद कोर्ट प्रैक्टिस के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने का एक व्यवस्थित रोडमैप मिलेगा।

  • अदालतों में मुकदमों की बेहतर समझ: 1 साल का कोर्ट एक्सपोजर नए जजों को बेंच पर बैठने से पहले वकीलों और मुवक्किलों के व्यवहार, समन, वारंट, साक्ष्य दर्ज करने और जिरह की बारीकियों से रूबरू कराएगा।

  • समय की बचत: 3 साल के लंबे इंतजार के मुकाबले 1 साल का समय छात्रों के करियर को गति देगा और न्यायिक चयन प्रक्रिया में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी।

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