Kanwar Yatra 2026 Starting & Ending Date: 13 दिनों की होगी इस बार की कांवड़ यात्रा, नोट कर लें जलाभिषेक की सही तारीख

सनातन धर्म में सावन (श्रावण) का महीना भगवान शिव (महादेव) की भक्ति और आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। सावन आते ही वातावरण पूरी तरह से शिवभक्ति के रंग में रंग जाता है और 'हर-हर महादेव' तथा 'बम-बम भोले' के जयकारों से दिशाएं गुंजायमान हो उठती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष सावन का महीना 30 जुलाई 2026 से शुरू होकर 28 अगस्त 2026 (सावन पूर्णिमा) तक रहेगा।
सावन के महीने में निकाली जाने वाली ऐतिहासिक और धार्मिक कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है। केसरिया वस्त्र धारण किए लाखों शिवभक्त (कांवड़िए) हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख और सुल्तानगंज जैसे पवित्र तीर्थों से गंगाजल भरने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं और फिर अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों में जाकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं।
कांवड़ यात्रा 2026 की शुरुआत और समापन की तारीख
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कांवड़ यात्रा का प्रारंभ: इस साल 30 जुलाई 2026 को सावन मास की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा का औपचारिक शुभारंभ हो जाएगा। इसी दिन से कांवड़िए पवित्र नदियों से जल भरना शुरू कर देंगे।
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सावन शिवरात्रि (प्रमुख जलाभिषेक दिवस): कांवड़ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण दिन सावन शिवरात्रि होता है। इस साल 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाएगा।
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कांवड़ यात्रा का समापन: 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव के जलाभिषेक के साथ ही वर्ष 2026 की कांवड़ यात्रा का विधिवत समापन हो जाएगा और भक्त अपना व्रत पूरा करेंगे।
मुख्य रूप से इस वर्ष कांवड़ यात्रा कुल 13 दिनों की होगी।
सबसे पहले रावण ने किया था कांवड़ जलाभिषेक: पौराणिक मान्यता
कांवड़ यात्रा की शुरुआत के पीछे एक बहुत ही प्रसिद्ध पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार:
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समुद्र मंथन और हलाहल विष: सावन के महीने में ही देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से अत्यंत जहरीला 'हलाहल विष' निकला था। संपूर्ण ब्रह्मांड को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ (गले) में धारण कर लिया था।
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नीलकंठ और शरीर का तापमान: विष के प्रभाव से महादेव का कंठ नीला पड़ गया (जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए) और उनके शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया।
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गंगाजल से जलाभिषेक: शिव जी के शरीर की जलन और तापमान को शांत करने के लिए सभी देवताओं और उनके परम भक्त रावण ने पवित्र गंगा नदी से जल लाकर महादेव का जलाभिषेक किया था।
माना जाता है कि तभी से सावन के महीने में पवित्र नदियों का जल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने और कांवड़ यात्रा निकालने की पावन परंपरा चली आ रही है।