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Lindsey Graham Bill Trump: क्या है ‘लिंडसे ग्राहम बिल’, जिससे थर्राए रूस और ईरान? 100% टैरिफ के दायरे में फंसा भारत; जानें अमेरिका के ‘ट्रिपल अटैक’ का पूरा इनसाइड गणित

अमेरिकी कांग्रेस ने हाल ही में वैश्विक प्रतिबंधों और व्यापारिक युद्ध के इतिहास का सबसे कड़ा कानून पारित किया है, जिसे 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' (Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026) नाम दिया गया है। दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम की स्मृति में समर्पित इस द्विदलीय (Bipartisan) विधेयक को अमेरिकी सीनेट (86-11) और प्रतिनिधि सभा (262-159) दोनों ने भारी बहुमत से मंजूरी दी, जिसके बाद यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मेज पर पहुंचा।

यह कानून केवल मॉस्को या तेहरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अमेरिका का 'ट्रिपल अटैक' माना जा रहा है। इसका पहला वार रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर है, दूसरा वार ईरान के ऊर्जा नेटवर्क पर है और तीसरा सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष वार उन तीसरे देशों पर है जो रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीद रहे हैं। इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को असीमित अधिकार दिए गए हैं कि वे रूसी ऊर्जा के शीर्ष खरीदारों पर 100% तक का दंडात्मक आयात शुल्क (Secondary Tariffs) थोप सकें।

क्या है इस कानून के मुख्य प्रावधान? (ट्रिपल अटैक की संरचना)

इस कानून में तीन मुख्य मोर्चों पर कड़े प्रतिबंधों का खाका खींचा गया है:

  • रूस पर 500% तक का सीधा टैरिफ: अमेरिका में आयात होने वाले सभी रूसी उत्पादों पर 500% तक का भारी-भरकम टैरिफ लागू करने और रूसी बैंकों (जैसे सेंट्रल बैंक ऑफ रूस, VTB, Sberbank) की संपत्तियों को ब्लॉक करने का प्रावधान है। इसके अलावा, रूसी तेल ढोने वाले 'शैडो फ्लीट' (Shadow Fleet) टैंकरों को अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ब्लॉक करने के नियम तय किए गए हैं।

  • ईरान सैंक्शंस एक्ट का विस्तार: कानून ने 'ईरान प्रतिबंध अधिनियम' (Iran Sanctions Act) की अवधि को अगले 5 वर्षों के लिए सीधे 2031 तक बढ़ा दिया है, जिससे तेहरान के तेल निर्यात, पेट्रोकेमिकल व्यापार और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट्स से जुड़ी कंपनियों पर वित्तीय नाकेबंदी और सख्त हो गई है।

  • सेकेंडरी टैरिफ (Top 5 खरीदारों पर 100% ड्यूटी): कानून की धारा 113 के तहत, राष्ट्रपति को यह कानूनी अधिकार दिया गया है कि वे रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदने वाले शीर्ष 5 देशों के सभी आयातों पर 100% तक का अतिरिक्त टैरिफ (Secondary Duty) लगा सकते हैं।

क्या भारत भी आएगा इस कानून के लपेटे में?

इस विधेयक के कानून बनते ही नई दिल्ली के कूटनीतिक और आर्थिक गलियारों में चिंता की लहर दौड़ गई है, क्योंकि भारत इस कानून की तकनीकी परिभाषा में सीधे तौर पर फिट बैठता है:

  • टॉप-5 खरीदार का दायरा: चीन के बाद भारत दुनिया में रूसी समुद्री कच्चे तेल (Urals Crude) का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। चूंकि भारत वॉल्यूम के लिहाज से शीर्ष पांच खरीदारों में शामिल है, इसलिए वह सीधे इस 100% सेकेंडरी टैरिफ के दायरे में आ जाता है।

  • अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात को खतरा: यदि वाशिंगटन भारत के खिलाफ इस टैरिफ शक्ति का प्रयोग करता है, तो अमेरिका जाने वाले भारतीय वस्त्र, जेम्स एंड ज्वैलरी, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटो-कंपोनेंट्स भारी ड्यूटी के कारण अमेरिकी बाजार में गैर-प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।

  • कानूनी मजबूती: इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने आपातकालीन शक्तियों (IEEPA) के तहत टैरिफ लगाए थे, जिन्हें अदालती चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। लेकिन लिंडसे ग्राहम एक्ट संसद द्वारा पारित कानून है, जिसे अदालत में चुनौती देना बेहद कठिन है।

भारत के पास क्या हैं बचाव के रास्ते और रणनीतिक विकल्प?

कानून सख्त जरूर है, लेकिन इसमें कुछ ऐसी कूटनीतिक खिड़कियां भी खुली हैं जिनका लाभ भारत उठा सकता है:

  • राष्ट्रपति की छूट (National Interest Waiver): कानून की धारा 115 के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह विवेकाधिकार (Executive Waiver) दिया गया है कि यदि राष्ट्रीय हित या रणनीतिक साझेदारी आवश्यक हो, तो वे किसी मित्र देश को इन प्रतिबंधों और शुल्कों से छूट दे सकते हैं।

  • विदेश मंत्रालय (MEA) का कड़ा रुख: भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत ने अमेरिका को स्पष्ट संकेत दिया है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की स्थिरता के लिए भारतीय रिफाइनरियों का चालू रहना जरूरी है, अन्यथा वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 120-150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।

  • व्यापार वार्ता और द्विपक्षीय सौदे: नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच जारी द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत भारत अमेरिका से तेल व एलएनजी (LNG) की खरीद बढ़ाकर एक संतुलन साधने की कोशिश कर सकता है, जिससे इस कानून के तहत संभावित दंडात्मक कार्रवाई को टाला जा सके।

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