Mandatory Voting: क्या अब वोट न देने पर होगी कार्रवाई? सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को अनिवार्य बनाने की याचिका पर दिया बड़ा बयान

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में क्या हर नागरिक के लिए मतदान करना अनिवार्य होना चाहिए? क्या वोट न देने वालों पर जुर्माना या दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए? इन गंभीर सवालों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने इस दौरान स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक को मतदान के लिए मजबूर करना सीधे तौर पर संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है।सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: ‘अधिकार’ और ‘बाध्यता’ के बीच का अंतरसुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में मतदान करना एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन इसे ‘बाध्यता’ (Compulsion) में बदलना संवैधानिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। जजों की बेंच ने संकेत दिया कि वोट न देने पर दंडात्मक कार्रवाई करने का सीधा असर नागरिक स्वतंत्रता पर पड़ सकता है। कोर्ट के अनुसार, लोकतंत्र की खूबसूरती नागरिक की अपनी इच्छा और विवेक से चुनाव करने में है, न कि डर के साये में वोट डालने में।क्या है याचिकाकर्ता की मांग और तर्क?सुप्रीम कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका (PIL) में मांग की गई थी कि देश में मतदान को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यदि मतदान अनिवार्य होता है और वोट न देने वालों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई या दंड का प्रावधान किया जाता है, तो इससे वोटिंग प्रतिशत में भारी इजाफा होगा। याचिका में कहा गया कि अधिक भागीदारी से लोकतंत्र और अधिक मजबूत और पारदर्शी बनेगा।लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोरन्यायालय ने इस मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए रेखांकित किया कि लोकतंत्र में नागरिकों को अपने अधिकारों के उपयोग की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसमें ‘वोट देना’ या ‘वोट न देना’—दोनों ही निर्णय व्यक्ति के अपने दायरे में आते हैं। कोर्ट ने फिलहाल इस मांग पर कोई भी सीधा आदेश देने से इनकार कर दिया और इसे ‘नीतिगत मामला’ करार दिया।केंद्र सरकार से मांगा जवाब: अब आगे क्या होगा?सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख जानने के लिए उन्हें नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट का मानना है कि इस तरह के बड़े बदलावों के लिए सरकार को गहराई से विचार करना चाहिए। आने वाले समय में जब केंद्र अपना पक्ष रखेगा, तब इस मुद्दे पर और अधिक संवैधानिक स्पष्टता सामने आने की उम्मीद है। फिलहाल के लिए, वोट देना आपकी अपनी मर्जी और अधिकार बना रहेगा।