Mangala Gauri Vrat 2026: सावन के मंगला गौरी व्रत पर ऐसे करें मां पार्वती की पूजा, जानिए सही पूजा विधि, 16 चीजों का महत्व और जरूरी नियम

पवित्र सावन (श्रावण) मास केवल भगवान शिव की आराधना तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह महीना आदिशक्ति माता पार्वती की कृपा पाने का भी सबसे उत्तम अवसर माना जाता है। सनातन परंपरा में सावन के महीने के हर सोमवार को भगवान भोलेनाथ के लिए 'सावन सोमवार व्रत' रखा जाता है, तो वहीं इस महीने में आने वाले हर मंगलवार को माता पार्वती के स्वरूप को समर्पित 'मंगला गौरी व्रत' रखने का विधान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो सुहागिन महिलाएं या अविवाहित कन्याएं निष्ठापूर्वक यह व्रत रखती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, सुयोग्य जीवनसाथी और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यदि आपके विवाह में बाधाएं आ रही हैं या दांपत्य जीवन में अनबन चल रही है, तो सावन के मंगला गौरी व्रत का पालन करने से सभी ग्रह दोष और समस्याएं दूर हो जाती हैं।
क्या है मंगला गौरी व्रत और सावन के मंगलवार को क्यों है इसका खास महत्व?
शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि सावन का पूरा महीना शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। जहां सोमवार का दिन शिवजी के पूजन के लिए समर्पित है, वहीं मंगलवार का दिन देवी मंगला गौरी यानी माता पार्वती के मंगलकारी रूप की पूजा के लिए अति फलदायी होता है। 'मंगला' का अर्थ है कल्याण करने वाली और 'गौरी' माता पार्वती का पावन नाम है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और इस व्रत के प्रभाव से ही उन्हें महादेव प्राप्त हुए थे। इसीलिए जो महिलाएं सावन के सभी मंगलवारों को मंगला गौरी का व्रत रखती हैं, उनके पति की आयु लंबी होती है, घर में खुशहाली आती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
मंगला गौरी व्रत की प्रामाणिक पूजा विधि: स्टेप-बाय-स्टेप समझें पूजन प्रक्रिया
मंगला गौरी व्रत की पूजा विधि बेहद विशेष और भक्तिमयी होती है। इस व्रत को पूरे विधान से करने पर ही इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। पूजा की सही प्रक्रिया इस प्रकार है:
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प्रातःकाल की तैयारी: व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। साफ-सुथरे कपड़े पहनें। इस दिन लाल, हरे, पीले या गुलाबी रंग के वस्त्र पहनना बेहद शुभ माना जाता है। काले या सफेद वस्त्र पहनने से बचें।
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व्रत का संकल्प: स्नान के बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर माता मंगला गौरी के समक्ष अपनी मनोकामना बोलते हुए व्रत का संकल्प लें।
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चौकी की स्थापना: पूजा स्थान पर एक लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल रंग का नया कपड़ा बिछाएं। चौकी पर माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। आप मिट्टी से बनी मंगला गौरी की प्रतिमा भी स्थापित कर सकते हैं।
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कलश और गणेश पूजन: किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी का पूजन किया जाता है। चौकी पर चावल की ढेरी बनाकर गणेश जी को विराजमान करें और कलश की स्थापना करें। सबसे पहले गणेश जी का जलाभिषेक करें और उन्हें दूर्वा, रोली व मोदक अर्पित करें।
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मां पार्वती का अभिषेक और श्रृंगार: माता मंगला गौरी को जल, दूध, पंचामृत और पुनः शुद्ध जल से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें लाल चुनरी ओढ़ाएं और रोली, कुमकुम, सिंदूर, अक्षत व चंदन लगाएं।
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16 श्रृंगार और भोग समर्पित करें: माता रानी को सुहाग की सामग्री और 16 प्रकार की वस्तुएं अर्पित करें। इसके बाद फल, मिठाई और विशेष रूप से आटे व गुड़ से बने मोदक या हलवे का भोग लगाएं।
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कथा और आरती: धूप-दीप प्रज्वलित करें और हाथ में 16 दाने गेहूं या चावल के लेकर 'मंगला गौरी व्रत कथा' का पाठ करें। कथा समाप्त होने के बाद 16 बत्तियों वाले दीये से माता गौरी की आरती उतारें।
पूजा में 16 चीजों का विशेष महत्व: अर्पित करें ये 16 वस्तुएं
मंगला गौरी व्रत की पूजा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें '16' अंक का विशेष महत्व माना गया है। माता गौरी को प्रसन्न करने के लिए हर एक पूजा सामग्री की संख्या 16 होनी चाहिए।
पूजा के दौरान माता पार्वती को 16 श्रृंगार की वस्तुएं (जैसे- सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी, आलता, काजल, शीशा, कंघी, चुनरी, बिछिया, पेयल, लिपस्टिक, नथ, रिबन, तेल और इत्र) अर्पित करें। इसके अलावा 16 फल, 16 फूल (जैसे लाल गुलाब या कमल), 16 मालाएं, 16 सुपारी, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 पान के पत्ते, 16 मेवे और 16 जीरा या धनिया के दाने चढ़ाने का विधान है। माना जाता है कि माता रानी को 16 चीजें अर्पित करने से साधक के जीवन के 16 प्रकार के कष्ट हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं और घर में धन-धान्य के भंडार भरे रहते हैं।
मंगला गौरी व्रत के अनिवार्य नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां
शास्त्रों में मंगला गौरी व्रत को अत्यंत पवित्र और नियमनिष्ठ माना गया है। इसका पालन करते समय कुछ बातों का खास ख्याल रखना चाहिए:
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भोजन और फलाहार का नियम: इस व्रत में केवल एक समय ही अन्न या फलाहार ग्रहण करने का नियम होता है। कई जगहों पर महिलाएं केवल एक बार फलाहार करती हैं और शाम की पूजा व आरती के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। भोजन में नमक का प्रयोग करने से बचें या केवल सेंधा नमक का ही सीमित उपयोग करें।
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नकारात्मक विचारों से दूरी: व्रत के दिन मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, क्रोध या द्वेष की भावना न लाएं। अपने जीवनसाथी या परिवार के सदस्यों से वाद-विवाद न करें।
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तामसिक चीजों का त्याग: सावन के महीने में और विशेषकर व्रत के दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा या किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन न बनने दें।
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सुहाग सामग्री का दान: पूजा के बाद माता गौरी को चढ़ाई गई 16 सुहाग सामग्रियों में से कुछ वस्तुएं किसी सौभाग्यवती ब्राह्मणी या जरूरतमंद विवाहित महिला को दान कर दें और उनका आशीर्वाद लें।
शीघ्र विवाह और अखंड सौभाग्य के लिए करें ये विशेष उपाय
यदि किसी कन्या के विवाह में लगातार देरी हो रही हो या कोई योग्य जीवनसाथी न मिल रहा हो, तो सावन के मंगला गौरी व्रत के दिन कुछ खास ज्योतिषीय उपाय करने से तुरंत लाभ मिलता है। व्रत के दिन पूजा के समय माता पार्वती को हलदी की 16 गांठें और 16 लाल गुलाब के फूल अर्पित करें। इसके साथ ही 'ॐ ह्रीं मंगला गौर्यै नमः' या 'हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम॥' मंत्र का 108 बार जाप करें। शादीशुदा महिलाएं इस दिन अपनी सास या किसी वरिष्ठ महिला के चरण छूकर उन्हें सुहाग का सामान भेंट करें। इन उपायों से कुंडली में मंगल ग्रह के दोष शांत होते हैं और दांपत्य जीवन में सदैव प्रेम और सामंजस्य बना रहता है।
सावन का मंगला गौरी व्रत श्रद्धा, समर्पण और भक्ति का प्रतीक है। जो भी भक्त सच्चे हृदय से माता मंगला गौरी की उपासना करते हैं, देवी पार्वती उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं और उनके जीवन को सुख, शांति व समृद्धि से भर देती हैं।