Moon Explosion: चांद पर हुआ अब तक का सबसे भयंकर धमाका! नासा ने खोज निकाला फुटबॉल मैदान जितना विशाल नया गड्ढा, अंतरिक्ष वैज्ञानिक हैरान

पृथ्वी के इकलौते प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा की शांत और रहस्यमयी सतह पर हुए एक जबर्दस्त खगोलीय धमाके ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के हाई-रेजोल्यूशन लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) ने चंद्रमा की सतह पर हाल ही में बने एक विशाल नए क्रेटर यानी गड्ढे की पहचान की है। नासा के खगोलविदों के अनुसार यह गड्ढा किसी अत्यंत तीव्र गति वाले उल्कापिंड (Meteorite) के सीधे टकराने से बना है। टक्कर इतनी जोरदार थी कि इसके प्रभाव से बना गड्ढा आकार में एक पूरे फुटबॉल मैदान से भी बड़ा नजर आ रहा है। चंद्रमा की निगरानी कर रहे लूनर इम्पैक्ट मॉनिटरिंग प्रोग्राम के तहत दर्ज यह विस्फोट हाल के दशकों में देखे गए सबसे शक्तिशाली प्रभावों में से एक माना जा रहा है, जिसने चंद्र भूविज्ञान और भविष्य के मानव मिशनों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
हवा और वायुमंडल का अभाव: क्यों इतना खतरनाक होता है उल्कापिंड का टकराना?
पृथ्वी और चंद्रमा के बीच का सबसे बड़ा अंतर वायुमंडल यानी सुरक्षा कवच का है। हमारी पृथ्वी के चारों ओर घना वायुमंडलीय घेरा मौजूद है। अंतरिक्ष से जब भी कोई क्षुद्रग्रह (Asteroid) या उल्कापिंड 50,000 से 90,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी की ओर आता है, तो वह मेसोस्फीयर में हवा के तीव्र घर्षण और अत्यधिक तापमान के कारण जलकर खाक हो जाता है, जिसे हम टूटता तारा कहते हैं। इसके विपरीत चंद्रमा पर कोई वायुमंडल या गैसों का सुरक्षा घेरा नहीं है। नतीजतन, अंतरिक्ष में भटकने वाला छोटा या बड़ा कोई भी उल्कापिंड बिना किसी रुकावट या गति मंद हुए सीधे चांद की मिट्टी यानी रेगोलिथ (Regolith) से टकराता है। नासा के वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस नए धमाके को अंजाम देने वाला उल्कापिंड बेहद सघन चट्टानी धातु का था, जिसकी गति लगभग 20 से 25 किलोमीटर प्रति सेकंड थी।
टीएनटी के कई टन बारूद जितना प्रभाव और 100 मीटर चौड़ा गड्ढा
नासा के वैज्ञानिकों द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक इस टक्कर से उत्पन्न ऊर्जा कई टन टीएनटी बारूद के विस्फोट के बराबर आंकी गई है। जब यह उल्कापिंड सतह से टकराया, तो अत्यधिक गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) के कारण एक क्षणिक लेकिन बेहद चमकदार फ्लैश उत्पन्न हुआ, जिसे पृथ्वी पर मौजूद शक्तिशाली दूरबीनों से भी एक सफेद चमकीले बिंदु के रूप में देखा जा सकता था। टक्कर के प्रभाव से चांद की सतह पर लगभग 70 से 100 मीटर व्यास का एक गहरा कटोरे जैसा गड्ढा बन गया। विस्फोट की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चंद्रमा की अंदरूनी सफेद चट्टानें और धूल के कण (Ejecta Blanket) मुख्य गड्ढे से कई किलोमीटर दूर तक बिखर गए, जिसने पुराने क्रेटरों की बनावट को भी आंशिक रूप से ढक दिया है।
ऑर्बिटर के एलआरओसी कैमरे ने खींची 'पहले और बाद' की तस्वीरें
इस अभूतपूर्व घटना की पुष्टि नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर कैमरा (LROC) द्वारा ली गई तुलनात्मक तस्वीरों से हुई है। ऑर्बिटर चंद्रमा की सतह की लगातार मैपिंग करता रहता है। वैज्ञानिक जब उस विशेष भूभाग की पुरानी छवियों (Before Images) का नए डेटा (After Images) से मिलान कर रहे थे, तो उन्हें सतह पर एक बिल्कुल नया और स्पष्ट निशान दिखाई दिया। तस्वीरों में गड्ढे के केंद्र से बाहर की ओर फैलती हुई चमकीली किरणें साफ दिखाई दे रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गड्ढा हाल के दिनों में बने फ्रेश क्रेटर्स की श्रेणी में आता है, क्योंकि सौर हवाओं और सूक्ष्म उल्कापिंडों के क्षरण (Space Weathering) का इस पर अभी कोई असर नहीं हुआ है और इसकी धारदार दीवारें एकदम नई अवस्था में हैं।
आर्टेमिस और चंद्र अभियानों पर क्या पड़ेगा इस धमाके का असर?
यह विशाल खगोलीय घटना ऐसे समय में सामने आई है जब नासा अपने महत्वाकांक्षी 'आर्टेमिस मिशन' के तहत चंद्रमा पर इंसानों को दोबारा भेजने और वहां स्थायी बेस कैंप बनाने की तैयारी में जुटा है। भारत का इसरो, चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम और यूरोपीय एजेंसियां भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लूनर बेस स्थापित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। ऐसे में फुटबॉल मैदान जितने बड़े गड्ढे का बनना यह साबित करता है कि अंतरिक्ष यात्रियों और उनके लूनर मॉड्यूल के लिए चांद की खुली जमीन पर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में चांद पर बनने वाली मानव बस्तियों को खुले मैदान के बजाय भूमिगत लावा ट्यूब्स (Lava Tubes) में बसाना होगा या फिर उनके ऊपर रेगोलिथ की कई मीटर मोटी सुरक्षात्मक दीवारें खड़ी करनी होंगी, ताकि वे अंतरिक्ष से बरसने वाले इन जानलेवा उल्कापिंडों के सीधे हमले से सुरक्षित रह सकें।