धर्म

NCERT Book Controversy: एनसीईआरटी किताबों में मनुस्मृति के श्लोक पर क्यों छिड़ा है विवाद? जानें पूरा मामला

महान विचारक स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी पुस्तक का मूल्यांकन उसके किसी एक पृष्ठ के आधार पर नहीं, बल्कि उसके समग्र अध्ययन से होना चाहिए। लेकिन भारतीय इतिहास और प्राचीन ग्रंथों के संदर्भ में अक्सर इसके विपरीत देखने को मिला है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त कुछ वैचारिक दृष्टिकोणों ने हमेशा मनुस्मृति के केवल एक पक्ष को उभारकर उसका विश्लेषण किया। प्राचीन काल के कुछ श्लोकों और उनके चुनिंदा अर्थों को आधार बनाकर लंबे समय से इस ग्रंथ का विरोध होता रहा है, इसे जातिगत भेदभाव का मुख्य कारण भी बताया गया। लेकिन इस बार राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने अपनी नई पाठ्यपुस्तकों में इसके एक दूसरे और सकारात्मक पक्ष को भी स्थान दिया है। पहली बार स्कूली पाठ्यक्रम में मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख किया जा रहा है, जिस पर अब एक नया विवाद खड़ा हो गया है।

कक्षा 9वीं के पाठ्यक्रम में हुआ शामिल, इतिहास के नए अध्याय में मिली जगह

एनसीईआरटी ने अपने नए संशोधित और आधुनिक पाठ्यक्रम के तहत कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान (Social Science) की इतिहास की पुस्तक में मनुस्मृति से जुड़े संदर्भ को शामिल किया है। इसे इतिहास के एक नए अध्याय, जिसका शीर्षक 'State and Society up to 1000 CE' (1000 ईस्वी तक राज्य और समाज) है, के अंतर्गत जोड़ा गया है। इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य छात्रों को प्राचीन भारतीय समाज की संरचना, शासन व्यवस्था और उस दौर के सामाजिक ताने-बाने से परिचित कराना है। हालांकि, सरकार और शिक्षा बोर्ड के इस फैसले पर भी कुछ संगठन और आलोचक लगातार प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

महिला सम्मान से जुड़ा है श्लोक, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' का पढ़ेंगे पाठ

9वीं कक्षा के छात्र अब इतिहास की इस नई किताब में महिलाओं के सम्मान को दर्शाने वाले मनुस्मृति के अध्याय 3 के 56वें श्लोक का अध्ययन करेंगे। इस प्रसिद्ध श्लोक का मूल भाव है- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" अर्थात् जहाँ महिलाओं का आदर और सत्कार होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है। पुस्तक में इस श्लोक के माध्यम से छात्रों को यह समझाने का प्रयास किया गया है कि प्राचीन भारतीय और वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति कितनी उच्च, गरिमापूर्ण और सम्मानित थी। उस दौर में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सार्वजनिक सभाओं, राजकाज और बड़े धार्मिक अनुष्ठानों में समान रूप से भाग लेती थीं। उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था और कई ऐतिहासिक संदर्भों में वे अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने (स्वयंवर) के लिए भी स्वतंत्र थीं।

किताब में निष्पक्षता का दावा: सिर्फ तारीफ नहीं, स्थिति में गिरावट का भी है जिक्र

इस नए बदलाव पर सवाल उठाने वालों के विपरीत एनसीईआरटी का कहना है कि पाठ्यक्रम को पूरी तरह निष्पक्ष और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप तैयार किया गया है। किताब में केवल एकतरफा तारीफ नहीं है, बल्कि उसके आगे का दूसरा पहलू भी ईमानदारी से दर्ज है। अध्याय में साफ लिखा है कि समय बीतने और राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के साथ, बाद के मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति में काफी उतार-चढ़ाव आया और उनकी सामाजिक स्थिति में गिरावट भी दर्ज की गई। इसके अलावा, इस चैप्टर में केवल महिलाओं की दशा ही नहीं, बल्कि प्राचीन 'वर्ण' और 'जाति' व्यवस्था के क्रमिक विकास पर भी विस्तार से चर्चा की गई है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि शुरुआती वैदिक समाज में किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान केवल उसके जन्म से तय नहीं होती थी, बल्कि उसके कर्म और योग्यता पर निर्भर करती थी।

इतिहास के पन्नों में मनुस्मृति दहन और आज के विरोध की असल वजह

एनसीईआरटी की किताब में मनुस्मृति के महज एक श्लोक का जिक्र होने के बावजूद कुछ राजनीतिक और सामाजिक संगठन इस फैसले का कड़ा विरोध कर रहे हैं। वे साल 1927 के उस ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला दे रहे हैं जब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक असमानता के विरोध में मनुस्मृति का दहन किया था। आलोचकों का तर्क है कि इस ग्रंथ को स्कूली शिक्षा का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। हालांकि, दूसरी ओर इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि मनुस्मृति कभी भी भारत का कोई आधिकारिक कानून लागू करने वाली किताब नहीं रही, बल्कि यह एक सामाजिक आचार संहिता थी। यह सच है कि इसमें कुछ बातें ऐसी हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और आज के हिसाब से पूरी तरह अप्रासंगिक और आपत्तिजनक हैं, लेकिन शिक्षा बोर्ड ने इसमें से केवल नैतिक मूल्य और सकारात्मक श्लोक को ही चुना है।

'विष से भी अमृत निकाल लेना चाहिए'— चाणक्य की नीति पर चला शिक्षा बोर्ड

महान कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में कहा था कि 'यदि विष में से भी अमृत प्राप्त हो, तो उसे निकाल लेना चाहिए और यदि गंदगी में भी सोना गिरा हो, तो उसे उठा लेना चाहिए।' एनसीईआरटी ने भी प्राचीन ज्ञान और ग्रंथों में से केवल उसी हिस्से को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया है जो समाज में नैतिक मूल्यों, महिलाओं के प्रति सम्मान और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है। लेकिन दुर्भाग्यवश, वैचारिक मतभेदों और नकारात्मक दृष्टिकोण के चलते इस शैक्षणिक बदलाव को सहजता से स्वीकार करने में बाधाएं आ रही हैं। बहरहाल, यह नया पाठ्यक्रम छात्रों को भारत के प्राचीन समाज को एक नए और व्यापक नजरिए से देखने का अवसर जरूर प्रदान करेगा।

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