Netanyahu’s Dilemma: सैन्य ताकत के बावजूद क्यों हार रहे हैं नेतन्याहू? ईरान के साथ युद्ध ने इजरायली पीएम के ‘विजेता’ बनने के सपने को दिया झटका

यरूशलम/तेल अवीव: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ युद्ध को अपनी राजनीतिक विरासत की सबसे बड़ी जीत बनाने का सपना देखा था। उन्हें उम्मीद थी कि तेहरान की सैन्य कमर तोड़कर वे न केवल इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, बल्कि इतिहास में ‘अजेय नेता’ के रूप में दर्ज होंगे। लेकिन युद्ध के छह हफ्ते बीत जाने के बाद भी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। भारी हथियारों और अमेरिकी समर्थन के बावजूद, नेतन्याहू सैन्य श्रेष्ठता को राजनीतिक और रणनीतिक सफलता में नहीं बदल पाए हैं।सैन्य ताकत बनाम रणनीतिक विफलता: दुश्मन अब भी मैदान मेंइजरायल के पास F-35 जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान और दुनिया का बेहतरीन मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, लेकिन विशेषज्ञ इसे “रणनीतिक विफलता” मान रहे हैं। रायटर्स (Reuters) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ डैनी सिट्रिनोविज का कहना है कि नेतन्याहू जीत नहीं रहे हैं। गाजा में हमास और लेबनान में हिजबुल्लाह कमजोर तो हुए हैं, लेकिन खत्म नहीं। वहीं, ईरान के परमाणु ठिकाने और मिसाइल क्षमता अब भी बरकरार है। सबसे बड़ी चिंता ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को लेकर है, जहाँ ईरान का नियंत्रण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गले की हड्डी बना हुआ है।अप्रूवल रेटिंग में भारी गिरावट: 10% से भी कम इजरायली खुश76 वर्षीय नेतन्याहू के लिए घरेलू मोर्चा भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। अक्टूबर में होने वाले चुनावों से ठीक पहले उनकी लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है। हालिया सर्वे (11 अप्रैल) के मुताबिक, केवल 10% इजरायली इस युद्ध को सफल मान रहे हैं, जबकि नेतन्याहू की व्यक्तिगत रेटिंग 40% से गिरकर 34% पर आ गई है। 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद उनकी छवि पर जो दाग लगा था, उसे धोने की कोशिश इस युद्ध के जरिए नाकाम होती दिख रही है।हवाई हमले और टारगेट किलिंग: क्या वाकई काम आए?इजरायल ने ईरान और उसके सहयोगियों के कई बड़े कमांडरों को निशाना बनाया है, लेकिन जानकारों का कहना है कि यह “भालू को मारने के बजाय उसे जगाने” जैसा साबित हुआ। पूर्व सलाहकार अविव बुशिंस्की के अनुसार, केवल टारगेट किलिंग से शासन नहीं गिरता। एक नेता की मौत के बाद दूसरा उसकी जगह ले लेता है, जिससे संघर्ष और लंबा खिंच जाता है। F-15 और F-35 विमानों की ताकत से मध्य पूर्व (Middle East) का नक्शा बदलने की सोच फिलहाल धरातल पर सफल नहीं दिख रही है।11.5 अरब डॉलर का बोझ और ‘जिन्नी बोतल से बाहर’इस युद्ध ने इजरायल की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाला है। अब तक करीब 11.5 अरब डॉलर (लगभग 96,000 करोड़ रुपये) खर्च हो चुके हैं। कूटनीतिज्ञों का मानना है कि अब ईरान पहले से ज्यादा “बोल्ड” महसूस कर रहा है। उसे लग रहा है कि वह अमेरिका और इजरायल के हमलों को झेल सकता है। इसका सबसे बुरा असर खाड़ी के उन अरब देशों पर पड़ेगा जिन्हें अब एक अधिक कट्टर और आक्रामक ईरानी नेतृत्व का सामना करना होगा। नेतन्याहू के लिए अब चुनौती सिर्फ युद्ध जीतना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक साख बचाना भी है।