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PoK बना सूडान: जनरल मुनीर के जुल्मों के आगे भी नहीं झुके बेकसूर कश्मीरी, पाकिस्तान की नापाक साजिशों का काला सच

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK के हालात इन दिनों किसी युद्धग्रस्त देश जैसे बन चुके हैं। पाकिस्तानी हुक्मरानों और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की दमनकारी नीतियों के चलते यह पूरा क्षेत्र मानवाधिकारों के हनन का एक जीवंत उदाहरण बन गया है। स्थानीय लोगों का जीवन दूभर हो चुका है, लेकिन इन सबके बावजूद कश्मीरी अवाम का हौसला टूटने का नाम नहीं ले रहा है। पाकिस्तानी सेना की अंधाधुंध फायरिंग और क्रूरता के बाद भी वहां के निवासियों का प्रतिरोध अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है।

PoK में सेना का तांडव और सूडान जैसे भयावह हालात

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पिछले कुछ समय से हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। आम नागरिकों द्वारा अपनी बुनियादी सुविधाओं, बढ़े हुए बिजली बिलों और महरेंगे राशन के खिलाफ शुरू किया गया शांतिपूर्ण प्रदर्शन उस वक्त खूनी संघर्ष में बदल गया, जब पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। सूडान की तर्ज पर PoK की सड़कों पर टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां उतार दी गईं। जनरल असीम मुनीर के सीधे आदेश पर सेना ने प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जिसमें कई बेकसूर लोग अपनी जान गंवा बैठे और सैकड़ों की संख्या में घायल हो गए। इस अमानवीय कृत्य ने पूरी दुनिया का ध्यान इस क्षेत्र में हो रहे अत्याचारों की ओर खींचा है।

गोलियों की बौछार के बीच भी बुलंद है स्थानीय अवाम का हौसला

इतिहास गवाह है कि जब-जब जुल्म की इंतिहा होती है, तब-तब जनता का विद्रोह और अधिक मुखर हो जाता है। PoK में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। पाकिस्तानी सेना की गोलियों और आंसू गैस के गोलों के बीच भी कश्मीरी युवाओं और बुजुर्गों के कदम पीछे नहीं हटे। सेना के खौफनाक रवैये के बावजूद लोग सड़कों पर उतरकर 'आजादी' और पाकिस्तान विरोधी नारे लगा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि वे अब और अधिक अत्याचार सहन नहीं करेंगे। सेना के जुल्म उनके दिलों से पाकिस्तान के प्रति उपजे गुस्से और प्रतिरोध की आग को बुझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन

एक तरफ जहां PoK के लोग बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी मीडिया और सरकार इस पूरी सच्चाई को दबाने में जुटी हुई है। इंटरनेट और संचार सेवाओं को बार-बार बाधित किया जा रहा है ताकि वहां होने वाले अत्याचारों की तस्वीरें दुनिया के सामने न आ सकें। मानवाधिकार संगठनों ने इस दमनकारी कार्रवाई की कड़ी निंदा की है, लेकिन पाकिस्तान की इस तानाशाही के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एक मजबूत और ठोस कार्रवाई की अभी भी दरकार है। स्थानीय नागरिकों का यह संघर्ष अब केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पाकिस्तान के अवैध कब्जे और उसकी दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ा मोड़ साबित हो रहा है।

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