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Quail Farming Business: पारंपरिक खेती छोड़ें! बटेर पालन से मात्र 40 दिनों में बनें लखपति, कड़कनाथ को भी दे रहा है कड़ी टक्कर

अगर आप भी पारंपरिक खेती या मुर्गी और बकरी पालन के घिसे-पिटे तरीकों से हटकर किसी ऐसे बिजनेस की तलाश में हैं जिसमें लागत कम और मुनाफा कई गुना हो, तो यह खबर आपके लिए है। पशुपालन के क्षेत्र में अब एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है— ‘बटेर पालन’ (Quail Farming)। यह एक ऐसा मुनाफे वाला सौदा बनकर उभरा है, जिसकी मार्केट में डिमांड इतनी अधिक है कि पक्षी फार्म से बाहर निकलने से पहले ही बुक हो जाते हैं।कम समय, ज्यादा कमाई का जादुई फॉर्मूलापशुपालन विशेषज्ञों के अनुसार, बटेर पालन मुर्गी पालन की तुलना में कहीं अधिक किफायती और तेज है।फास्ट ग्रोथ: जहाँ एक ब्रॉयलर मुर्गे को तैयार होने में काफी समय और दाना लगता है, वहीं बटेर मात्र 35 से 40 दिनों में पूरी तरह तैयार होकर बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाता है।सालाना टर्नओवर: कम समय में तैयार होने के कारण, एक किसान साल भर में बटेर की कई खेप (Batches) निकाल सकता है, जिससे लाखों की कमाई सुनिश्चित होती है।क्यों बढ़ रही है इसकी डिमांड? औषधीय गुणों का खजानाबाजार में बटेर के मांस और अंडों की मांग बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण इसके स्वास्थ्य लाभ हैं:सेहत का खजाना: बटेर के मांस में प्रोटीन भरपूर होता है, जबकि फैट और कोलेस्ट्रॉल न के बराबर होता है। जिम जाने वाले और डाइट के प्रति जागरूक लोगों के लिए यह पहली पसंद बन रहा है।बीमारियों में रामबाण: इसके अंडों को अस्थमा, एनीमिया और पाचन संबंधी समस्याओं में काफी लाभकारी माना जाता है।कम जगह, कम खर्च: बटेर को पालने के लिए बहुत बड़े शेड या महंगे चारे की जरूरत नहीं पड़ती। आप एक छोटे से कमरे या बाड़े में भी हजारों बटेर पाल सकते हैं।कड़कनाथ ने भी पकड़ी रफ़्तार: ₹1200 प्रति किलो तक भावबटेर के साथ-साथ ‘कड़कनाथ’ मुर्गे का क्रेज भी लगातार बढ़ रहा है। पूरी तरह काले रंग के इस पक्षी का मांस ₹800 से ₹1200 प्रति किलो तक बिक रहा है। जो किसान पारंपरिक पोल्ट्री फार्मिंग छोड़कर कड़कनाथ और बटेर की तरफ रुख कर रहे हैं, उनकी आमदनी में 3 से 4 गुना इजाफा देखा जा रहा है।बीमारियों का रिस्क कम, मुनाफा ज्यादापशुपालन विशेषज्ञों का कहना है कि बटेर में रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) अन्य पक्षियों के मुकाबले काफी ज्यादा होती है। मुर्गियों की तरह इसमें बर्ड फ्लू या अन्य संक्रमणों का खतरा बहुत कम रहता है। इसका मतलब है कि किसान का निवेश सुरक्षित रहता है और नुकसान की संभावना न के बराबर होती है।

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