सियासत में चमक रहा हिमंता और ममता ब्रांड क्या विचारधारा पर भारी पड़ रहा है चेहरा? सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा

News India Live, Digital Desk: भारतीय राजनीति के समकालीन दौर में क्या अब पार्टियों की विचारधारा से ज्यादा नेताओं का अपना व्यक्तिगत ‘ब्रैंड’ बड़ा होता जा रहा है? हाल ही में आए एक दिलचस्प विश्लेषण और सर्वे ने राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। चार राज्यों के चुनावी मूड और जनता की पसंद पर आधारित इस रिपोर्ट में सामने आया है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसे नेताओं का चेहरा अब उनकी पार्टी के कैडर और विचारधारा से भी ज्यादा प्रभावशाली साबित हो रहा है।हिमंता बिस्वा सरमा: भाजपा के लिए ‘अजेय’ योद्धापूर्वोत्तर की राजनीति में हिमंता बिस्वा सरमा एक ऐसे ब्रैंड बनकर उभरे हैं, जिनकी धमक अब असम की सीमाओं को लांघकर पूरे देश में सुनाई दे रही है। सर्वे के मुताबिक, असम में भाजपा की मजबूती के पीछे पार्टी के झंडे से ज्यादा हिमंता की अपनी कार्यशैली और निर्णय लेने की क्षमता है। वे न केवल हिंदुत्व के मुद्दे पर मुखर रहते हैं, बल्कि विकास कार्यों के जरिए अपनी एक ऐसी छवि गढ़ी है जो पार्टी के समर्पित वोट बैंक से परे भी लोगों को आकर्षित कर रही है। आज की तारीख में वे भाजपा के लिए एक ऐसे ‘ब्रांड एंबेसडर’ बन चुके हैं जिनका वजन कई बार पार्टी की पुरानी संगठनात्मक पहचान से भी भारी पड़ता है।ममता बनर्जी: बंगाल की इकलौती ‘फाइटर’दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का जादू आज भी बरकरार है। ‘दीदी’ का ब्रैंड ऐसा है कि वहां तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मतलब ही ममता बनर्जी बन गया है। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि बंगाल की जनता विचारधारा के बजाय ममता बनर्जी की लड़ाकू छवि और उनकी कल्याणकारी योजनाओं पर अधिक भरोसा करती है। भाजपा की तमाम चुनौतियों के बावजूद, ममता का व्यक्तिगत प्रभाव इतना गहरा है कि वे अकेले दम पर विपक्ष के बड़े से बड़े गठबंधन को कड़ी टक्कर देने की क्षमता रखती हैं।राज्यों में बदल गया जीत का फॉर्मूलायह रिपोर्ट इशारा करती है कि भारत के राज्यों में अब ‘चेहरा’ ही ‘चुनावी इंजन’ बन चुका है। चाहे वह झारखंड हो, ओडिशा हो या पूर्वोत्तर के राज्य, मतदाता अब पार्टी के चुनावी घोषणापत्र से ज्यादा इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि नेतृत्व किसके हाथ में है। हिमंता और ममता जैसे नेता इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि यदि नेता का अपना ब्रैंड मजबूत हो, तो वह अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिला सकता है। विचारधारा अपनी जगह है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए अब एक प्रभावशाली और करिश्माई व्यक्तित्व अनिवार्य शर्त बन गया है।