Sawan Sankashti Chaturthi 2026: सावन में गजानन संकष्टी चतुर्थी पर सर्वार्थ सिद्धि योग, जानें सही शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

नई दिल्ली: सावन के पवित्र महीने में पड़ने वाली गजानन संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक दृष्टि से बहुत बड़ा और खास महत्व माना जाता है। इस बार गजानन संकष्टी चतुर्थी 2 अगस्त 2026, रविवार को पूरे देश में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाई जा रही है। यह दिन विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की आराधना और व्रत के लिए बेहद फलदायी माना गया है। संकष्टी चतुर्थी के दिन भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और रात में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने व्रत का पारण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से गणपति बप्पा की पूजा करते हैं, उनके जीवन से सभी प्रकार के दुख और संकट दूर हो जाते हैं। इस वर्ष सावन की संकष्टी चतुर्थी पर 'सर्वार्थ सिद्धि योग' का भी निर्माण हो रहा है, जो ज्योतिष शास्त्र में अत्यंत शुभ माना गया है। इस योग में की गई पूजा-अर्चना का कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है।
तिथि और शुभ मुहूर्त: जानें किस समय करें गणपति जी की पूजा
हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 1 अगस्त 2026 की रात 11:07 बजे से हो चुकी है, जिसका समापन 2 अगस्त 2026 को रात 11:15 बजे होगा। उदया तिथि की मान्यता के कारण गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत 2 अगस्त को ही रखा जा रहा है।
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अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:19 बजे से दोपहर 1:11 बजे तक।
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गणेश पूजा का शुभ समय: सुबह 7:25 बजे से दोपहर 12:26 बजे तक।
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चंद्रोदय का समय (अर्घ्य का समय): रात 9:43 बजे।
गजानन संकष्टी चतुर्थी की आसान और प्रामाणिक पूजा विधि
संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह स्नान-ध्यान के पश्चात पूजा स्थल की अच्छे से सफाई करें और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। बप्पा को जल अर्पित करने के बाद रोली, अक्षत, सिंदूर, फूल और दूर्वा चढ़ाएं। गणेश जी की पूजा में दूर्वा (दूब घास) का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है। इसके उपरांत धूप-दीप जलाकर उन्हें मोदक, मोतीचूर के लड्डू या ऋतु फल का भोग लगाएं। पूजा के समय 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप करें और गणेश चालीसा या गणेश स्तुति का पाठ करें। अंत में आरती करके परिवार के कल्याण और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही पूरा होता है संकष्टी चतुर्थी का व्रत
संकष्टी चतुर्थी व्रत में चंद्र देव की पूजा और उन्हें अर्घ्य देने का विशेष विधान है। दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखने के बाद भक्त रात में चंद्रोदय का इंतजार करते हैं। 2 अगस्त को रात 9:43 बजे जैसे ही चंद्रदेव प्रकट हों, एक लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें थोड़े से अक्षत और सफेद फूल मिलाएं। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करें और बप्पा का ध्यान करें। शास्त्रों के अनुसार, चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। अर्घ्य देने के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें।