UPI पेमेंट पर GST घटाने की तैयारी! 18% से 5% करने पर चर्चा, जानें आम ग्राहकों और दुकानदारों को कितनी मिलेगी राहत

देशभर में चाय की टपरी से लेकर बड़े रिटेल मॉल तक हर जगह ऑनलाइन पेमेंट का सबसे बड़ा जरिया बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI को लेकर एक बहुत बड़ा अपडेट सामने आया है। वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी काउंसिल की महत्वपूर्ण बैठक में यूपीआई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) और पेमेंट सर्विसेज पर लगने वाले 18 प्रतिशत जीएसटी को घटाकर सीधे 5 प्रतिशत करने के अहम प्रस्ताव पर विचार-विमर्श शुरू हुआ है। इस खबर के सामने आते ही करोड़ों छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और रोजमर्रा खरीदारी करने वाले आम ग्राहकों के मन में कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा भ्रम यह फैला है कि क्या अब गूगल पे, फोनपे या पेटीएम से किसी को भी पैसे भेजने पर टैक्स देना पड़ेगा? सरकार और वित्तीय विशेषज्ञों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह टैक्स आम लोगों के बैंक ट्रांसफर पर नहीं, बल्कि पेमेंट गेटवे और बैंकों द्वारा मर्चेंट्स पर लगाए जाने वाले सर्विस चार्ज (MDR) पर घट सकता है। यदि काउंसिल इस प्रस्ताव पर अपनी अंतिम मुहर लगा देती है, तो देश के डिजिटल कॉमर्स और खासकर छोटे व्यापारियों के लिए यह एक क्रांतिकारी राहत साबित होगी।
क्या है पूरा मामला और जीएसटी काउंसिल में किस बात पर हुई है बड़ी चर्चा
जीएसटी काउंसिल की नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में राज्यों के वित्त मंत्रियों और नीति निर्धारकों ने डिजिटल पेमेंट्स इकोसिस्टम को अधिक टिकाऊ और वहनीय बनाने पर गंभीर मंथन किया है। दरअसल, यूपीआई के बढ़ते दायरे के साथ बैंकों, एनपीसीआई और पेमेंट एग्रीगेटर्स के बुनियादी ढांचे की लागत बढ़ रही है। इस व्यवस्था को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने के लिए चुनिंदा बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शंस (विशेषकर 2,000 रुपये से अधिक के वाणिज्यिक भुगतान) पर प्रस्तावित मामूली मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की चर्चा चल रही थी। वर्तमान नियमों के तहत बैंकों या पेमेंट कंपनियों द्वारा ली जाने वाली किसी भी वित्तीय सेवा शुल्क पर सीधे 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी लागू होता है। कई राज्यों और उद्योग संगठनों ने यह वाजिब चिंता जताई कि अगर इस प्रोसेसिंग फीस पर 18 फीसदी जैसा भारी टैक्स स्लैब बना रहा, तो छोटे कारोबारी डिजिटल लेन-देन छोड़कर फिर से नकदी की तरफ मुड़ सकते हैं। इसी जोखिम को समाप्त करने और मर्चेंट्स की लागत घटाने के लिए अब इस टैक्स को सबसे निचले 5 प्रतिशत के स्लैब में लाने का मसौदा तैयार किया गया है।
आम जनता की जेब पर क्या होगा असर, क्या आपको भी देना पड़ेगा टैक्स
इस पूरे मसौदे में आम जनता के लिए सबसे बड़ी और राहत भरी बात यह है कि पर्सन-टू-पर्सन (P2P) यानी आम लोगों द्वारा एक-दूसरे के बैंक खाते में भेजे जाने वाले पैसों पर न तो कोई चार्ज है और न ही कोई टैक्स। अगर आप अपने किसी मित्र, परिवार के सदस्य या रिश्तेदार को 500 रुपये, 2,000 रुपये या 50,000 रुपये यूपीआई से ट्रांसफर करते हैं, तो वह पहले की तरह ही पूरी तरह मुफ्त रहेगा। ठीक इसी प्रकार, यदि आप किसी मोहल्ले के किराना स्टोर, फल-सब्जी विक्रेता, दूध की डेयरी या दवा की दुकान पर जाकर सामान्य खरीदारी करते हैं, तो आपके बैंक खाते से केवल सामान की असली कीमत ही कटेगी। ग्राहक को किसी भी प्रकार का सरचार्ज या सर्विस टैक्स अपनी जेब से नहीं चुकाना होगा। यह राहत पूरी तरह व्यापारिक लेन-देन की बैक-एंड कॉस्ट से जुड़ी है, जिससे ग्राहक को किसी भी अतिरिक्त वित्तीय बोझ का सामना नहीं करना पड़ेगा।
दुकानदारों और व्यापारियों को कितनी और कैसे मिलेगी असली राहत
इस टैक्स कटौती का सबसे सीधा और बड़ा फायदा देश के छोटे रिटेलर्स, एमएसएमई और उन दुकानदारों को मिलेगा जो जीएसटी कंपोजिशन स्कीम के तहत पंजीकृत हैं या जिनका टर्नओवर सीमा से कम होने के कारण वे अनरजिस्टर्ड हैं। बड़े कॉर्पोरेट और जीएसटी में नियमित रजिस्टर्ड व्यापारी तो पेमेंट कंपनियों द्वारा वसूले गए 18% टैक्स पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) क्लेम कर लेते हैं, लेकिन छोटे मोहल्ले के दुकानदार आईटीसी का दावा नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में 18% जीएसटी उनकी दुकानदारी का सीधा घाटा बन जाता है। इसे एक सरल गणित से समझें: यदि किसी मर्चेंट पर कुल महीने का प्रोसेसिंग शुल्क 1,000 रुपये बनता है, तो 18% की दर से उसे 180 रुपये टैक्स देना पड़ता था। लेकिन दर घटकर 5% होने पर यह टैक्स भार गिरकर मात्र 50 रुपये रह जाएगा। यानी व्यापारी की जेब से टैक्स के रूप में कटने वाला खर्च 70 प्रतिशत से अधिक कम हो जाएगा। इससे स्थानीय बाजारों में काम करने वाले छोटे दुकानदारों का मार्जिन सुरक्षित रहेगा और वे बिना किसी हिचकिचाहट के क्यूआर कोड से भुगतान स्वीकार करते रहेंगे।
दिल्ली-एनसीआर से लेकर लखनऊ और ग्रामीण भारत तक डिजिटल इकोनॉमी को रफ्तार
उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, बिहार, राजस्थान और महाराष्ट्र समेत देश के सभी टियर-1, टियर-2 और ग्रामीण बाजारों में यूपीआई अब व्यापार की जीवनरेखा बन चुका है। लखनऊ के अमीनाबाद और हजरतगंज के थोक बाजारों से लेकर कानपुर, नोएडा, वाराणसी और पटना के रिटेल हब तक हर दिन करोड़ों छोटे-बड़े सौदे क्यूआर कोड स्कैन करके पूरे होते हैं। स्थानीय व्यापारिक संगठनों का कहना है कि सरकार यदि सर्विस चार्ज पर टैक्स की दर 5% पर सीमित रखती है, तो इससे नकदी पर निर्भरता खत्म करने के राष्ट्रीय मिशन को नई मजबूती मिलेगी। जब बैंक और फिनटेक कंपनियों पर टैक्स का बोझ कम होगा, तो वे साउंडबॉक्स, पीओएस मशीन और सुरक्षित पेमेंट गेटवे जैसी आधुनिक सुविधाएं दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में भी बेहद किफायती दरों पर उपलब्ध करा सकेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों के साथ सहमति बनने के बाद जल्द ही जीएसटी परिषद इस ऐतिहासिक फैसले की औपचारिक अधिसूचना जारी कर सकती है, जो भारत के डिजिटल भविष्य को और अधिक समावेशी बनाएगी।