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US-Iran Geopolitics: अमेरिका-ईरान शांति समझौते की अंदरूनी कहानी; युद्धविराम के 5 बड़े पेंच, क्या नेतन्याहू बिगाड़ेंगे खेल?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ एक ऐतिहासिक 'शांति समझौते' (US-Iran Peace Deal) का एलान कर दुनिया भर में सनसनी मचा दी है। इस अचानक हुए घटनाक्रम ने मिडिल ईस्ट (Middle East) की पूरी जियोपॉलिटिक्स और समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। ट्रंप का कड़ा दावा है कि अमेरिका-ईरान युद्ध अब पूरी तरह खत्म हो चुका है, रणनीतिक रूप से संवेदनशील समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) दोबारा खुलेगा और अमेरिकी सेना अपनी सख्त नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगी।

लेकिन रुकिए! यह इस पूरी कहानी की महज आधी हकीकत है। सच तो यह है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता से तैयार इस समझौते (MoU) पर आगामी शुक्रवार को स्विट्जरलैंड की धरती पर सिर्फ आधिकारिक दस्तखत होने हैं, जबकि इसकी सबसे संवेदनशील और असली शर्तें अब भी बंद तिजोरी में हैं। ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक आधिकारिक हस्ताक्षर नहीं होते, वह इसे पूरी तरह लागू नहीं मानेगा। वहीं, अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि नाकेबंदी शुक्रवार के बाद ही हटाई जाएगी। तो आखिर इस महाडील के पीछे का असली खेल क्या है? आइए, आसान भाषा में इस पूरी इनसाइड स्टोरी को डिकोड करते हैं।

1. क्या सच में थम गई जंग? जानिए शुरुआती डील के 3 मुख्य बिंदु

इस शुरुआती समझौते का सबसे बड़ा और तात्कालिक मकसद मिडिल ईस्ट में जारी भीषण सैन्य टकराव को रोकना और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे इसके साइड-इफेक्ट्स को समाप्त करना है:

  • सैन्य अभियानों पर फुल स्टॉप: मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के अनुसार, दोनों पक्षों ने लेबनान सहित सभी सक्रिय मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से रोकने का एलान किया है।

  • सस्ता होगा क्रूड ऑयल: ईरान महीनों से बंद पड़े 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को फिर से व्यापारिक जहाजों के लिए खोलने पर सहमत हो गया है, जिससे वैश्विक बाजार में तेल, गैस और फर्टिलाइजर की सप्लाई चेन बहाल होगी। इस खबर के आते ही अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी मार्केट में ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (WTI) की कीमतें 4% से ज्यादा टूट गईं

  • हटेगी अमेरिकी नाकेबंदी: इन रियायतों के बदले में अमेरिका, ईरान के रणनीतिक बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिकों द्वारा की गई अपनी सख्त घेराबंदी (Naval Blockade) को पूरी तरह हटा लेगा।

2. 60 दिनों का टाइम बम: परमाणु कार्यक्रम का गहरा सस्पेंस

यह समझौता सिर्फ एक तात्कालिक कूटनीतिक 'पुल' है, कोई परमानेंट इलाज नहीं। असली और विवादित मुद्दों को सुलझाने के लिए 60 दिनों का 'सीजफायर पीरियड' (युद्धविराम अवधि) तय किया गया है, जिसमें सबसे बड़ा रोड़ा ईरान का परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) है:

यूरेनियम का खतरनाक स्टॉक: इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास इस समय 440.9 किलोग्राम ऐसा यूरेनियम मौजूद है जो 60% शुद्धता तक संवर्धित (Enriched) है। इसे हथियार-ग्रेड (90% वेपन ग्रेड) तक ले जाने में बस कुछ ही हफ्तों का वक्त लगेगा।

  • अमेरिका बनाम ईरान की जिद: अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी चाहते हैं कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह नष्ट किया जाए और संवर्धित यूरेनियम देश से बाहर भेजा जाए। दूसरी तरफ, ईरान इसे देश के अंदर ही सिर्फ 'डाइल्यूट' (पतला) करने की जिद पर अड़ा है। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने साफ किया है कि ईरान पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में राहत तभी मिलेगी जब वह ठोस कदम उठाएगा।

3. $25 अरब के फ्रीज फंड पर 'तू-तू मैं-मैं'

विदेशी बैंकों में जब्त और फ्रीज की गई ईरानी वित्तीय संपत्तियों को लेकर दोनों देशों के दावों में जमीन-आसमान का अंतर है, जो बातचीत को बिगाड़ सकता है:

  • ईरान की सख्त शर्त: ईरानी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि समझौते के अगले चरण पर बढ़ने के लिए अमेरिका को पहले उनके जब्त 25 अरब डॉलर (करीब ₹2 लाख करोड़) रिलीज करने होंगे।

  • अमेरिका का करारा जवाब: दूसरी ओर, अमेरिकी अधिकारियों ने मीडिया (CNN) से बातचीत में कहा कि यह दावा सरासर झूठ है। यह पूरी तरह से एक 'पे फॉर परफॉर्मेंस' (काम के बदले दाम) डील है; जब तक ईरान लिखित कसमों और वादों को जमीन पर पूरा नहीं करता, उसे एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी जाएगी।

4. ईरान की घातक मिसाइलें और हिज़्बुल्लाह का भविष्य

इस पूरे पीस फ्रेमवर्क में सबसे रहस्यमयी और चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें ईरान के खतरनाक बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम (Ballistic Missile Network) या मिडिल ईस्ट क्षेत्र में सक्रिय उसके हथियारबंद सहयोगियों (Proxy Groups) का कोई सीधा जिक्र नहीं है। महीनों की जंग और बमबारी के बाद भी ईरान का मिसाइल नेटवर्क और क्षेत्रीय दबदबा जस का तस मजबूत है, जिसे लेकर भविष्य की कूटनीतिक वार्ताओं में भारी खींचतान होना तय माना जा रहा है।

5. इजरायल का 'विलेन' अवतार: क्या नेतन्याहू बिगाड़ेंगे खेल?

इस पूरी सीक्रेट डील में अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी इजरायल को कहीं भी शामिल नहीं किया गया था, जिससे वह बेहद नाराज है। इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) का साफ कहना है कि वह लेबनान में अपनी 'कार्रवाई की आजादी' (Freedom of Action) को किसी समझौते के लिए नहीं छोड़ेगा, जो कि इस सीजफायर की मूल शर्तों के खिलाफ है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू को फोन कर उन्हें 'एक बहुत ही मुश्किल व्यक्ति' बताया और तंज कसा कि नेतन्याहू को उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने इजरायल को एक परमाणु-सशस्त्र ईरान के सीधे खतरे से बचा लिया। इजरायल के इस आक्रामक रुख को देखते हुए भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह शांति समझौता बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है और कभी भी टूट सकता है।

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