असम में ब्रह्मपुत्र के उफान से हाहाकार! बाढ़ और भूस्खलन से 1.35 लाख से अधिक लोग बेघर, अब तक 85 लोगों ने गंवाई जान

विशेष संवाददाता, गुवाहाटी: पूर्वोत्तर भारत के सबसे प्रमुख राज्य असम में मानसूनी बारिश और उफनती नदियों ने भयंकर तबाही मचा रखी है। ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी दर्जनों सहायक नदियों के रौद्र रूप के कारण राज्य के 20 से अधिक जिलों में जलप्रलय जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस साल आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन (Landslides) की घटनाओं में जान गंवाने वालों का आंकड़ा बढ़कर 85 तक पहुंच गया है। वहीं, 1.35 लाख से अधिक लोग अपना घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हो चुके हैं। खेत-खलिहान, सड़कें, पुल और रेलवे ट्रैक पानी में डूब चुके हैं, जिससे कई इलाकों का संपर्क पूरी तरह कट गया है।
असम के धुबरी, कछार, करीमगंज, लखीमपुर, धेमाजी, नागांव, गोलाघाट, दरांग और कामरूप (मेट्रो) जिले बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं। ब्रह्मपुत्र नदी गुवाहाटी, धुबरी, तेजपुर और नेमातीघाट में खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही है। इसके अलावा बराक, कपिली, सुबनसिरी और भोराली जैसी नदियां भी अपने उफान पर हैं। एनडीआरएफ (NDRF), एसडीआरएफ (SDRF), भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन की टीमें दिन-रात रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर जलमग्न गांवों में फंसे बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रही हैं। हजारों हेक्टेयर में खड़ी धान की फसल पानी में डूबकर बर्बाद हो चुकी है, जिससे किसानों पर बड़ा आर्थिक संकट मंडरा रहा है।
क्यों हर साल जलमग्न हो जाता है असम? जानिए इस तबाही के 5 मुख्य कारण
असम में हर साल आने वाली बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि इसके पीछे राज्य की विशिष्ट भौगोलिक बनावट, नदियों का नेटवर्क और मानवीय कारक भी जिम्मेदार हैं। आइए समझते हैं कि आखिर क्यों यह राज्य मानसून आते ही पानी में समा जाता है:
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ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र और अत्यधिक गाद (Brahmaputra River System & Siltation):
असम की जीवनरेखा कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी दुनिया की सबसे बड़ी और उग्र नदियों में से एक है। चीन (तिब्बत) से निकलकर अरुणाचल प्रदेश के रास्ते असम में प्रवेश करने वाली यह नदी अपने साथ विशाल मात्रा में गाद (Silt) और मलबा लेकर आती है। सालों से नदी के तल में गाद जमा होने के कारण नदी की गहराई काफी कम हो गई है। नतीजतन, जैसे ही मानसून में पानी की मात्रा बढ़ती है, नदी अपने किनारों को तोड़कर मैदानी इलाकों में फैल जाती है।
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भौगोलिक बनावट और मानसूनी मूसलाधार बारिश (Topography & Rain):
असम चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ एक समतल मैदानी इलाका (Valley) है। जब अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और भूटान की पहाड़ियों पर मूसलाधार बारिश या बादल फटने की घटनाएं होती हैं, तो सारा पानी बहकर असम की घाटी में आ जाता है। संकरे मैदानी इलाके होने के कारण जल निकासी (Drainage System) की क्षमता सीमित पड़ जाती है, जिससे अचानक बाढ़ की स्थिति बन जाती है।
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कमजोर और जर्जर हो चुके तटबंध (Weak Embankments):
असम में बाढ़ से बचाव के लिए ज्यादातर तटबंध (Embankments) 1950 और 1960 के दशक में बनाए गए थे। इनमें से अधिकांश तटबंध अपनी मियाद पूरी कर चुके हैं और रखरखाव के अभाव में जर्जर हो चुके हैं। जब नदियों में जलस्तर बढ़ता है, तो ये तटबंध दबाव झेल नहीं पाते और जगह-जगह से टूट जाते हैं, जिससे सैकड़ों गांव एक साथ जलमग्न हो जाते हैं।
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भूटान और पड़ोसी राज्यों से पानी का बहाव:
भूटान के पहाड़ी इलाकों में बने बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं (Hydroelectric Projects) से जब अतिरिक्त पानी छोड़ा जाता है, तो असम के निचले जिलों जैसे कोकराझार, बक्सा, चिरांग और बारपेटा में अचानक जलस्तर बढ़ जाता है। अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय जल प्रबंधन का कोई ठोस समझौता न होना भी इस आपदा को बढ़ाता है।
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काजीरंगा नेशनल पार्क और वन्यजीवों पर संकट:
इस जलप्रलय का असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। विश्व प्रसिद्ध काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (Kaziranga National Park) का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा पानी में डूब चुका है। एक सींग वाले दुर्लभ गैंडों, हाथियों, हिरणों और अन्य वन्यजीवों को अपनी जान बचाने के लिए कारबी आंगलोंग की ऊंची पहाड़ियों की ओर पलायन करना पड़ रहा है। इस दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग पार करते समय कई बेजुबान जानवर तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आकर या पानी में डूबकर जान गंवा रहे हैं।
सरकार की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव कार्य तेज कर दिए गए हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय और असम सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। प्रभावित परिवारों को सूखा राशन, तिरपाल, दवाइयां और साफ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 500 से अधिक राहत शिविर (Relief Camps) स्थापित किए गए हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक असम में नदियों की 'ड्रेजिंग' (तलहट की सफाई), आधुनिक कंक्रीट तटबंधों का निर्माण और भूटान-चीन के साथ मिलकर दीर्घकालिक जल प्रबंधन नीति नहीं बनाई जाएगी, तब तक असम को हर साल इस भयानक त्रासदी से बचाना मुश्किल बना रहेगा।