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सिनेमाघरों में क्यों नहीं आई अनुराग कश्यप की निशांची 2? डायरेक्टर ने सीधा दर्शकों पर फोड़ा ठीकरा

News India Live, Digital Desk: अनुराग कश्यप बॉलीवुड के उन डायरेक्टरों में से हैं जो अपनी बेबाक राय और अलग तरह की फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उनकी फिल्मों का एक खास दर्शक वर्ग हमेशा इंतजार करता है। लेकिन हाल ही में जब उनकी नई फिल्म ‘निशांची 2’ (Nishaanchi 2) सिनेमाघरों की बजाय सीधे ओटीटी पर रिलीज हो गई, तो कई लोगों के मन में सवाल उठा कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?इस सवाल का जवाब जब खुद अनुराग कश्यप से पूछा गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह बिना किसी लाग-लपेट के सीधा और कड़वा सच सामने रख दिया। उन्होंने अपनी फिल्म के ओटीटी पर आने की वजह किसी और को नहीं, बल्कि सीधे तौर पर दर्शकों को ही ठहराया है।”अगर दर्शक थिएटर में आए होते…”अनुराग कश्यप ने साफ शब्दों में कहा कि अगर दर्शक उनकी पिछली फिल्में देखने के लिए सिनेमाघरों तक गए होते, तो आज प्रोड्यूसर्स में यह हिम्मत होती कि वे ‘निशांची 2’ को भी बड़े पर्दे पर रिलीज करते। उन्होंने कहा, “अगर दर्शक सिनेमाघरों में आए होते और निर्माता को यह भरोसा होता कि लोग टिकट खरीदकर फिल्म देखने आएंगे, तो यह फिल्म भी सिनेमाघरों में ही आती।”उनका इशारा साफ था। आजकल दर्शक अच्छी और अलग तरह की फिल्मों की तारीफ तो करते हैं, लेकिन उन्हें देखने के लिए घर से निकलकर थिएटर जाने की जहमत नहीं उठाते। वे इंतजार करते हैं कि फिल्म कुछ ही हफ्तों में ओटीटी पर आ जाएगी, और वे उसे आराम से घर बैठे देख लेंगे।प्रोड्यूसर के लिए पैसा है सबसे ज़रूरीअनुराग ने फिल्म बनाने के अर्थशास्त्र को भी समझाया। उन्होंने कहा कि कोई भी प्रोड्यूसर करोड़ों रुपए लगाकर फिल्म इसलिए बनाता है ताकि वह अपना पैसा वापस कमा सके। जब उन्हें यह दिखता है कि किसी खास तरह की फिल्म के लिए दर्शक सिनेमाघरों में नहीं आ रहे हैं, तो उनके लिए सबसे सुरक्षित रास्ता ओटीटी ही बचता है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स फिल्म के लिए एकमुश्त अच्छी रकम दे देते हैं, जिससे प्रोड्यूसर का घाटा होने का खतरा खत्म हो जाता है।दिल में है बड़े पर्दे का दर्दअनुराग कश्यप ने यह भी माना कि एक फिल्ममेकर के तौर पर वह अपनी हर फिल्म बड़े पर्दे के अनुभव के लिए ही बनाते हैं। उन्होंने अपनी पिछली फिल्म ‘कैनेडी’ (Kennedy) का उदाहरण दिया, जिसे कांस फिल्म फेस्टिवल जैसे दुनिया के बड़े मंच पर स्टैंडिंग ओवेशन मिला, लेकिन भारत में उसे सिनेमाघरों में रिलीज करने के लिए खरीदार नहीं मिले।यह हिंदी सिनेमा की एक नई हकीकत है, जहाँ दर्शकों की बदलती आदतों ने यह तय कर दिया है कि कौन सी फिल्म बड़े पर्दे पर धमाल मचाएगी और कौन सी चुपचाप ओटीटी पर आकर गुम हो जाएगी।

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