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अगले 5 महीनों में भीषण गर्मी से हो सकती है साढ़े 3 लाख से अधिक लोगों की मौत, भारत पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा खतरा

वैश्विक जलवायु परिवर्तन और मौसम के बदलते मिजाज से जुड़ी एक बेहद डरावनी और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आ रही है। दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु शोधकर्ताओं को चिंतित करने वाले 'सुपर अल नीनो' (Super El Nino) ने अब अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया है। प्रतिष्ठित 'क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब' (Climate Impact Lab) द्वारा जारी किए गए ताजा आंकड़े और डराने वाले नक्शे ने पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस खतरनाक मौसमी परिघटना के कारण अगले पांच महीनों के भीतर वैश्विक स्तर पर भीषण गर्मी के चलते साढ़े तीन लाख से अधिक अतिरिक्त मौतें होने की आशंका जताई गई है। सबसे हैरानी और चिंता की बात यह है कि इस भयंकर आपदा के सबसे बड़े शिकार बनने वाले देशों की सूची में हमारा देश भारत भी शीर्ष पर शामिल है। आइए विस्तार से जानते हैं कि सुपर अल नीनो की यह स्थिति क्यों पैदा हुई है और इसका पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत पर कितना घातक असर पड़ने वाला है।

अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर के आंकड़े: अक्टूबर 2026 से मार्च 2027 के बीच मंडरा रहा है बड़ा खतरा

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब द्वारा हाल ही में जारी किए गए 'अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर' (El Nino Heat Mortality Tracker) के अनुसार, आने वाले महीने मानवता के लिए बेहद कठिन साबित हो सकते हैं। इस भयावह मॉडल और नक्शे के मुताबिक, अक्टूबर 2026 से लेकर मार्च 2027 के बीच के पांच महीनों में अत्यधिक तापमान और भीषण गर्मी के कारण दुनिया भर में लगभग 373,000 अतिरिक्त लोगों की जान जाने का खतरा मंडरा रहा है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह संकट केवल एक सामान्य मौसम बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानी स्वास्थ्य और जीवन के लिए एक बड़ा वैश्विक संकट बनता जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इन संभावित कुल मौतों में से लगभग एक-तिहाई यानी बहुत बड़ा हिस्सा केवल तीन विकासशील देशों—नाइजीरिया, भारत और ब्राजील—में होने का अनुमान लगाया गया है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उष्णकटिबंधीय (Tropical) देशों पर इसका सबसे गहरा प्रहार होगा।

प्रशांत महासागर में तापमान का पारा 3.4 डिग्री सेल्सियस तक हुआ पार

सुपर अल नीनो की यह भयावह स्थिति तब उत्पन्न हुई है जब समुद्र की सतह के तापमान को मापने वाली प्रणाली में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। पूर्वी-मध्य प्रशांत महासागर के 'नीनो 3.4' (Nino 3.4) क्षेत्र में पानी का तापमान सामान्य से 3.4 डिग्री सेल्सियस यानी 6 डिग्री फारेनहाइट से भी ज्यादा ऊपर पहुंच गया है। यह खतरनाक तापमान 18 से 24 अक्टूबर के सप्ताह के दौरान रिकॉर्ड किया गया था।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, आने वाले महीनों यानी नवंबर से जनवरी के बीच यह मौसमी परिघटना तापमान को सामान्य अल नीनो की तुलना में छह गुना से भी ज्यादा तेजी से बढ़ा सकती है। यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने नौ महीनों के कुल चक्र (जून 2026 से मार्च 2027) के दौरान गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों के अनुमान को संशोधित करके 857,400 तक पहुंचा दिया है, जो वैज्ञानिकों के शुरुआती अनुमान से लगभग 350,000 अधिक है।

भारत और नाइजीरिया पर सबसे बड़ा खतरा, जानिए किन देशों में जा सकती है सबसे ज्यादा जान?

शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किए गए इस मॉडल में दुनिया भर के लगभग 3,700 क्षेत्रों को शामिल किया गया है और इसके जरिए यह अनुमान लगाया गया है कि अत्यधिक गर्मी का यह प्रकोप भौगोलिक रूप से किस देश को सबसे ज्यादा तबाह करेगा:

  • नाइजीरिया: इस भीषण और जानलेवा गर्मी का सबसे बुरा असर अफ्रीकी देश नाइजीरिया पर पड़ने की आशंका है, जहां इस अवधि के दौरान गर्मी से जुड़ी 56,000 से अधिक मौतें हो सकती हैं।

  • भारत: इस ग्लोबल मॉडल के अनुसार नाइजीरिया के ठीक बाद दूसरे सबसे बड़े जोखिम वाले देश के रूप में भारत का नाम सामने आया है, जहां 55,200 से ज्यादा लोगों की जान खतरे में पड़ने की आशंका जताई गई है। भारत के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी और हीटवेव का यह प्रकोप गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल पैदा कर सकता है।

  • इंडोनेशिया: इस सूची में तीसरे स्थान पर इंडोनेशिया है, जहां अल नीनो के प्रभाव से 29,300 लोगों की जान जाने का खतरा मंडरा रहा है।

  • अन्य देश: इसके अलावा ब्राजील में 19,500 और सूडान में 14,700 लोगों के इस भीषण गर्मी की चपेट में आकर अपनी जान गंवाने की आशंका व्यक्त की गई है।

अतीत के प्रभावों को देखें तो जून के बाद से ही अल नीनो के कारण दुनिया भर में लगभग 484,500 अतिरिक्त मौतें हो चुकी हैं, जिसके स्पष्ट प्रमाण इंडोनेशिया के जंगलों में लगी भयंकर आग, भारत में महत्वपूर्ण मानसूनी बारिश के पैटर्न का गड़बड़ाना और मध्य अमेरिका में पड़े गंभीर सूखे के रूप में सामने आ चुके हैं।

नीति-निर्माताओं और सरकारों के लिए समय रहते कड़े कदम उठाने की सख्त जरूरत

इस पूरी रिसर्च के मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन (Michael Greenstone) ने कहा कि इस आधुनिक पूर्वानुमान तकनीक (Predictive Capability) की मदद से हम यह पहले ही भांप सकते हैं कि आने वाले समय में इंसानी जिंदगियों पर सबसे बड़ा खतरा कहां मंडरा रहा है।

प्रोफेसर ग्रीनस्टोन ने जोर देकर कहा कि अत्यधिक गर्मी के जानलेवा और विनाशकारी प्रभावों का सटीक अनुमान लगा पाना एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कदम है। इसका मुख्य फायदा यह है कि इससे दुनिया भर की सरकारों और नीति-निर्माताओं (Policy Makers) को यह समय पर पता चल जाएगा कि कौन सी आबादी सबसे ज्यादा खतरे में है, जिससे वे लोगों कीमती जानें बचाने के लिए पहले से ही ठोस और निवारक कदम उठा सकें। यदि समय रहते ग्लोबल वार्मिंग और इस सुपर अल नीनो के प्रभावों से निपटने के लिए प्रभावी स्थानीय नीतियां नहीं बनाई गईं, तो आने वाले महीने मानवता के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं।

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