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अमेरिका-चीन के बीच कोल्ड वॉर 2.0 क्यूबा के आसमान में दिखा $240 मिलियन का अमेरिकी जासूसी ड्रोन

News India Live, Digital Desk: अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव ने अब कैरिबियाई द्वीप क्यूबा के आसमान में एक नया मोड़ ले लिया है। अमेरिका का सबसे आधुनिक और महंगा जासूसी ड्रोन MQ-4C ट्राइटन (Triton), जिसकी कीमत करीब 240 मिलियन डॉलर (लगभग 2000 करोड़ रुपये) है, क्यूबा के ऊपर उड़ता हुआ देखा गया है। ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, इस हाई-प्रोफाइल जासूसी अभियान ने बीजिंग और हवाना में हड़कंप मचा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की ओर से चीन के ‘ग्लोबल सर्विलांस नेटवर्क’ को करारा जवाब है।क्यूबा के ऊपर क्या कर रहा था ‘ट्राइटन’?MQ-4C ट्राइटन महज़ एक साधारण ड्रोन नहीं है, बल्कि यह एक उड़ता हुआ जासूसी स्टेशन है। खुफिया सूत्रों के अनुसार, इसके क्यूबा के चक्कर काटने के पीछे ठोस कारण हैं:चीनी जासूसी बेस पर नज़र: हालिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि चीन ने क्यूबा में एक बड़ा सैन्य प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी जुटाने का बेस स्थापित किया है। अमेरिका इसी बेस की गतिविधियों और वहां लगे सिग्नल्स को इंटरसेप्ट करने के मिशन पर था।मिसाइल ट्रैकिंग और निगरानी: ट्राइटन ड्रोन 360-डिग्री रडार कवरेज के साथ 55,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर लगातार 24 घंटे उड़ान भर सकता है। यह क्यूबा के तटों पर होने वाली किसी भी संदिग्ध समुद्री गतिविधि को ट्रैक कर रहा था।$240 मिलियन की ‘उड़ती आंख’ की खासियतरेंज और क्षमता: यह ड्रोन एक बार में हज़ारों वर्ग मील के क्षेत्र को स्कैन कर सकता है। इसकी तकनीक इतनी एडवांस है कि यह समुद्र में जहाजों के प्रकार और उनकी गतिविधियों की पहचान पलक झपकते ही कर लेता है।खराब मौसम में भी बेअसर: इसे विशेष रूप से समुद्री निगरानी के लिए बनाया गया है, जो बादलों और तूफान के बीच भी साफ तस्वीरें लेने में सक्षम है।चीन और क्यूबा की तीखी प्रतिक्रियाचीन ने अमेरिका के इस कदम को ‘संप्रभुता का उल्लंघन’ और क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश बताया है। वहीं, क्यूबा सरकार ने इसे अमेरिका की ‘धमकाने वाली नीति’ का हिस्सा करार दिया है। गौरतलब है कि पिछले साल जब अमेरिका ने चीन के एक कथित ‘जासूसी गुब्बारे’ को मार गिराया था, तब से दोनों देशों के बीच आसमान में जारी यह लुका-छिपी का खेल और अधिक खतरनाक हो गया है।रूस की भी है पैनी नज़रदिलचस्प बात यह है कि जिस समय अमेरिकी ड्रोन क्यूबा के पास मंडरा रहा था, उसी दौरान अटलांटिक महासागर में रूसी नौसेना की सक्रियता भी दर्ज की गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि क्यूबा एक बार फिर महाशक्तियों के बीच ‘जासूसी का अखाड़ा’ बनता जा रहा है, जो 1962 के ‘मिसाइल संकट’ की याद दिलाता है।

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