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आसमान में बादल पर बरस नहीं रही बूंदें; 100 साल का तीसरा सबसे सूखा जून, ‘अल नीनो’ ने बिगाड़ा खेल

क्या आपको भी लग रहा है कि इस बार जून के महीने में वैसी राहत और बारिश नहीं दिखी, जैसी अमूमन मानसून के दस्तक देने पर होती है? आपका सोचना बिल्कुल सही है. देश में इस साल मानसून की सुस्ती ने ऐसा रुख अख्तियार किया है कि पिछले 100 सालों का रिकॉर्ड टूटने की कगार पर पहुंच गया है. आसमान में बादलों की आवाजाही तो बनी हुई है, लेकिन वे बिना बरसे ही आगे निकल रहे हैं. देश के किसान से लेकर आम शहरी तक हर कोई टकटकी लगाए बारिश का इंतजार कर रहा है, जबकि मौसम के आंकड़े एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं.

आंकड़ों में दर्ज हुआ एक सदी का तीसरा सबसे सूखा जून

भारतीय मौसम विज्ञान के इतिहास में इस साल का जून महीना एक बेहद कमजोर मानसून सीजन के रूप में दर्ज होने जा रहा है. आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 100 वर्षों (साल 1927 से 2026) की अवधि में यह तीसरा सबसे सूखा जून महीना साबित होने की राह पर है. सामान्य तौर पर इस पूरे महीने में देश के भीतर 157.7mm बारिश दर्ज की जानी चाहिए थी, लेकिन इस बार अब तक केवल 92.2mm बारिश ही रिकॉर्ड की जा सकी है. अगर महीने के अंतिम दिनों में कुछ जगहों पर बौछारें पड़ती भी हैं, तो भी कुल आंकड़ा बमुश्किल 100mm के आसपास ही सिमट जाएगा. इससे पहले देश ने साल 2009 में 87.5mm और साल 2014 में 92.1mm की सबसे कम बारिश देखी थी.

अल नीनो के प्रभाव से कमजोर पड़ा मानसूनी सिस्टम

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस साल मानसून की इस सुस्त रफ्तार और बेरुखी के पीछे 'अल नीनो' (El Niño) का सीधा असर है. अंतरराष्ट्रीय जलवायु एजेंसियों की रिपोर्ट बताती है कि प्रशांत महासागर का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिसके चलते अल नीनो अब मध्यम स्तर पर सक्रिय हो चुका है. जब भी अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है, भारतीय उपमहाद्वीप में मानसूनी हवाओं का पैटर्न पूरी तरह प्रभावित होता है. इसके चलते भारत के वायुमंडल में बनने वाले मानसूनी बादल कमजोर हो जाते हैं और देश के मैदानी इलाकों तक पहुंचते-पहुंचते उनकी तीव्रता काफी कम हो जाती है.

देश के चारों भौगोलिक क्षेत्रों में भारी कमी

इस मानसूनी सीजन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि सूखे का असर देश के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि चारों प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र इसकी जद में हैं. मध्य भारत (Central India) की स्थिति सबसे ज्यादा नाजुक बनी हुई है, जहां सामान्य के मुकाबले 54% कम बारिश रिकॉर्ड हुई है. इसके साथ ही पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत में 41%, उत्तर-पश्चिम भारत में 30% और दक्षिण भारतीय राज्यों में 28% बारिश की भारी कमी दर्ज की गई है. देश के सभी रीजन्स में एक साथ मानसून का ग्राफ इस तरह गिरना बेहद दुर्लभ माना जाता है, जो अल नीनो के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है.

केरल में कमजोर एंट्री के बाद जुलाई से बंधी उम्मीदें

इस पूरे महीने में केवल एक दिन ऐसा रहा जब देश के कुछ हिस्सों में सामान्य के करीब या उससे थोड़ी बेहतर बारिश दर्ज की गई. केरल के तट पर 4 जून को मानसून की एंट्री काफी धीमी रही थी, जिसके बाद से ही इसके आगे बढ़ने की रफ्तार लगातार प्रभावित होती रही. इसके कारण कृषि क्षेत्रों में बुआई का काम काफी पिछड़ गया है. हालांकि, मौसम विभाग (IMD) के ताजा पूर्वानुमानों ने एक नई उम्मीद जरूर जगाई है. आईएमडी के अनुसार, जुलाई के पहले सप्ताह से मौसम का मिजाज बदलने की संभावना है. मध्य भारत सहित देश के सूखे प्रभावित इलाकों में अच्छी और समान बारिश होने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे जून के दौरान हुई कमी की भरपाई होने की पूरी संभावना है.

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