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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नेता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार, जानें क्या था पूरा विवाद?

प्रयागराज | इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष नूर अहमद अजहरी को राहत देने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने अजहरी के खिलाफ एक विवादास्पद वीडियो को लेकर चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले के इस शुरुआती चरण में आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता और कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।विवाद की जड़: क्या था वायरल वीडियो में?यह पूरा मामला अप्रैल 2023 का है, जब गैंगस्टर से राजनेता बने अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की पुलिस हिरासत में हत्या हुई थी। इस घटना के बाद नूर अहमद अजहरी का एक वीडियो वायरल हुआ था।आरोप: पुलिस के अनुसार, वीडियो में अजहरी ने दावा किया था कि भाजपा शासित राज्यों की सरकारें मुसलमानों को डराने की कोशिश कर रही हैं।साजिश का दावा: उन्होंने कथित तौर पर कहा कि अतीक-अशरफ की हत्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में रची गई एक साजिश थी।संविधान पर टिप्पणी: अजहरी ने आरोप लगाया था कि भाजपा का संविधान में कोई विश्वास नहीं है और उसने लोकतांत्रिक मूल्यों को रौंद डाला है।कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप’हाई कोर्ट ने एफआईआर और पुलिस की चार्जशीट का अवलोकन करते हुए कहा कि अजहरी पर एक विशेष समुदाय में धार्मिक उत्तेजना और सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का गंभीर आरोप है।”आवेदक की टिप्पणियां प्रथम दृष्टया सरकार के प्रति घृणा पैदा करने और लोगों को दंगे या अशांति फैलाने के लिए उकसाने वाली प्रतीत होती हैं। इससे सार्वजनिक शांति और व्यवस्था भंग होने का खतरा है।” — इलाहाबाद हाई कोर्टकानूनी धाराएं और अजहरी का तर्कपीलीभीत के पूरनपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज इस मामले में पहले IPC की धारा 153A (शत्रुता को बढ़ावा देना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) लगाई गई थी। बाद में पुलिस ने धारा 505(2) (नफरत फैलाने वाले बयान) के तहत चार्जशीट दाखिल की।अजहरी का बचाव: उन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने केवल सार्वजनिक चर्चा में अपने विचार रखे थे और उनका कोई आपराधिक इरादा नहीं था। उन्होंने मजिस्ट्रेट के समन आदेश को भी चुनौती दी थी।अदालत का फैसला: कोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को सही माना कि तथ्यात्मक मुद्दों की गहराई से जांच केवल ‘ट्रायल’ (मुकदमे) के दौरान ही हो सकती है, इसलिए याचिका में कोई दम नहीं है।एक अन्य फैसला: ‘झूठा केस दर्ज कराना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं’इसी दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों को लेकर एक और बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने एक पत्नी को राहत देते हुए कहा कि यदि पत्नी या उसके रिश्तेदार पति के खिलाफ कानूनी मामला दर्ज कराते हैं, तो उसे ‘आत्महत्या के लिए उकसाना’ (Abetment to Suicide) नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने माना कि कानूनी अधिकार का उपयोग करना किसी को जान देने के लिए मजबूर करना नहीं है।

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