उत्तर प्रदेश

उम्रकैद की सजा पाए हत्यारोपी शिक्षक को मिलती रही सैलरी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए कड़े जांच के आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग से जुड़ा एक हैरान करने वाला मामला सामने आने के बाद गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने एक ऐसे सहायक अध्यापक को लगातार वेतन दिए जाने के मामले में गहन जांच के आदेश दिए हैं, जिसे हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। यह मामला जनहित, सरकारी धन के दुरुपयोग और शिक्षा व्यवस्था की पारदशितार् से जुड़ा हुआ है, जिस पर कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है।

क्या है पूरा मामला और कैसे उठा विवाद

यह पूरा कानूनी विवाद बलिया जिले के सिकंदरपुर स्थित श्री व्यंतानंद संस्कृत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से जुड़ा हुआ है। यहां तैनात सहायक अध्यापक सुधाकर शुक्ला को साल 2011 के एक हत्या मामले (क्राइम नंबर 289/2011) में मुख्य आरोपी पाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने 15 जुलाई 2015 को उसे आईपीसी की धारा 302, 34 और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सजा मिलने के बाद उसने हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपील दाखिल की, जो अभी भी विचाराधीन है। जेल में करीब 13 साल की वास्तविक सजा और छूट (रेमिशन) मिलाकर 14 साल पूरे करने के बाद हाईकोर्ट ने उसे 29 जुलाई 2024 को जमानत पर रिहा कर दिया था। जमानत मिलने के बाद बलिया के तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) ने 14 मार्च 2026 को एक आदेश जारी कर आरोपी शिक्षक के वेतन भुगतान के लिए सैलरी अकाउंट के सिंगल-ऑपरेशन की अनुमति दे दी थी। इसी आदेश को विद्यालय की प्रबंध समिति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और स्वतंत्र जांच के निर्देश

मामلا न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि केवल जमानत मिलने का मतलब यह नहीं है कि निचली अदालत की दोषसिद्धि (Conviction) पर रोक लग गई है या वह रद्द हो गई है। जब तक सक्षम अदालत दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाती, तब तक किसी दोषी को सरकारी नौकरी और वेतन पाने का अधिकार नहीं मिल सकता। राज्य सरकार के वकील ने भी इस बात का समर्थन किया। इन तर्कों को सुनने के बाद जस्टिस विनोद दिवाकर ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि इसमें जनता का पैसा शामिल है और इससे राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है, इसलिए रिकॉर्ड को पारदर्शी रखना और कानून का सख्ती से पालन करना बेहद जरूरी है।

अदालत ने बलिया के वर्तमान जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) को निर्देश दिया है कि वे इस पूरे भुगतान प्रकरण की गहराई से जांच करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच केवल संबंधित पक्षों द्वारा सौंपे गए कागजातों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। डीआईओएस को शिक्षण संस्थान, अपने खुद के कार्यालय, संयुक्त निदेशक शिक्षा कार्यालय, शिक्षा निदेशालय और संबंधित अदालतों के रिकॉर्ड की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी होगी। इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 10 सितंबर तय की गई है और उससे पहले विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया है।

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