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कच्चा तेल पहुंचा 100 डॉलर के पार, 120 डॉलर तक जाने का अंदेशा, महंगा क्रूड ऑयल किन-किन सेक्टरों पर डालेगा भारी असर

मध्य पूर्व (Middle East) में सुलग रही जंग और भू-राजनीतिक तनावों ने वैश्विक बाजारों में खलबली मचा दी है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही ठप होने और लाल सागर में हूती विद्रोहियों द्वारा तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भयंकर उछाल देखने को मिला है। ब्रेंट क्रूड के दाम एक ही दिन में 6.62 डॉलर प्रति बैरल उछलकर मई के बाद पहली बार 100 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गए हैं। वहीं, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 92 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी चेतावनियों के बावजूद सप्लाई चेन पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए एक्सपर्ट्स अनुमान लगा रहे हैं कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो कच्चा तेल जल्द ही 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकता है।

लाल सागर से लेकर हॉर्मुज तक गहराया सप्लाई संकट

वैश्विक तेल बाजार में यह हाहाकार अचानक नहीं मचा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तनातनी के चलते दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग यानी हॉर्मुज स्ट्रेट में ट्रांसपोटेशन पहले ही प्रभावित हो चुका है। अब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमले शुरू कर दिए हैं, जिससे स्थिति और ज्यादा विस्फोटक हो गई है। इसके अलावा, रूस के काला सागर तट पर कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम टर्मिनल पर हुए हमलों ने भी कजाकिस्तान के तेल निर्यात को झटका दिया है। इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल मैनेजमेंट के CEO जे हैटफील्ड का कहना है कि यदि लाल सागर में शिपिंग ट्रैफिक न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया, तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर तक जाने से कोई नहीं रोक सकता।

किन प्रमुख सेक्टरों पर पड़ेगा सबसे भारी असर?

कच्चे तेल की कीमतों में आई इस बेकाबू तेजी का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा और गहरा प्रभाव देश-दुनिया की अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख सेक्टरों पर पड़ने वाला है:

  • ऑटोमोबाइल और ट्रांसपोर्ट: कच्चे तेल के महंगे होने से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे, जिससे लॉजिस्टिक्स, ट्रक, बस और माल ढुलाई की लागत में भारी इजाफा होगा। इसका सीधा असर रोजमर्रा की सब्जी, फल और एफएमसीजी उत्पादों के दाम बढ़ने के रूप में जनता की जेब पर पड़ेगा।

  • एविएशन सेक्टर: एयरलाइंस कंपनियों के कुल खर्च में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है। क्रूड महंगा होने से विमान ईंधन के दाम बढ़ेंगे, जिसका दबाव अंततः हवाई यात्रा के महंगे किराए के रूप में यात्रियों पर आ सकता है।

  • पेंट, प्लास्टिक और केमिकल: पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल की लागत बढ़ने से पेंट, प्लास्टिक पाइप, पैकेजिंग मटेरियल, सिंथेटिक रबर और विभिन्न केमिकल बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन लागत काफी बढ़ जाएगी।

  • कृषि और उर्वरक: खेती में इस्तेमाल होने वाले ट्रैक्टर, सिंचाई पंप और फसलों की मंडियों तक ढुलाई पूरी तरह डीजल और ऊर्जा लागत पर निर्भर है। क्रूड के महंगा होने से खेती-किसानी की लागत बढ़ेगी, जिससे खाद्य महंगाई (Food Inflation) और तेजी से ऊपर जा सकती है।

  • FMCG और पैकेजिंग: साबुन, शैम्पू, बिस्कुट और पैकबंद खाद्य पदार्थों की प्लास्टिक पैकेजिंग और ढुलाई महंगी होने से कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बनेगा, जिससे खुदरा सामानों के दाम भी बढ़ सकते हैं।

  • टेक्सटाइल उद्योग: पॉलिएस्टर और अन्य सिंथेटिक फाइबर सीधे तौर पर पेट्रोकेमिकल चेन से जुड़े होते हैं, इसलिए कच्चे तेल में तेजी आने से कपड़ों के निर्माण की लागत भी बढ़ जाती है।

  • सीमेंट, स्टील और इंफ्रास्ट्रक्चर: भारी मशीनरी, सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाला बिटुमेन और भारी माल ढुलाई डीजल पर टिकी है। महंगा क्रूड देश में चल रही बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की लागत को भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है।

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