क्या भारत के साथ रणनीतिक संबंधों और दोस्ती पर पड़ेगा कोई असर

इजरायल में आज यानी 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनाव देश के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जो इजरायल की राजनीति में पिछले कई दशकों से सबसे प्रभावी चेहरा रहे हैं, इस बार अपने राजनीतिक करियर की सबसे कड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। ओपिनियन पोल में उनकी पार्टी लिकुड को पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट (Gadi Eisenkot) की यशार पार्टी और अन्य विपक्षी दलों से कड़ी टक्कर मिल रही है। ऐसे में दुनिया भर के कूटनीतिक गलियारों में यह सवाल बड़ा हो गया है कि यदि नेतन्याहू सत्ता से बाहर होते हैं, तो क्या भारत और इजरायल के बीच चली आ रही गहरी दोस्ती और रणनीतिक साझेदारी पर कोई फर्क पड़ेगा?
भारत और इजरायल के रिश्ते किसी एक व्यक्ति या नेता की व्यक्तिगत केमिस्ट्री से कहीं आगे बढ़कर संस्थागत रूप ले चुके हैं। कूटनीतिक जानकारों और इजरायली दूतावास के स्पष्ट बयानों के अनुसार, यह रिश्ता मजबूत नींव पर टिका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच की व्यक्तिगत दोस्ती ने पिछले कुछ वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों को एक नई गति जरूर दी है, लेकिन दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, कृषि तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान, जल प्रबंधन और खुफिया साझाकरण जैसे क्षेत्र इतने गहरे और व्यापक हैं कि वहां की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन होने के बावजूद इनमें किसी भी तरह की गिरावट आने की कोई संभावना नहीं है। भारत के लिए पश्चिम एशिया में इजरायल एक भरोसेमंद साझेदार रहा है और नई दिल्ली के साथ तेल अवीव के संबंध दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों पर आधारित हैं।
इजरायल के इन चुनावों में मुख्य मुद्दा पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के सामने आए सुरक्षा संकट, गाजा और ईरान से जुड़े संघर्ष और नेतन्याहू की कार्यशैली रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि गादी आइजेनकोट या कोई अन्य विपक्षी गठबंधन सत्ता में आता भी है, तो भी इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति और भारत जैसे अहम रणनीतिक मित्रों के साथ विदेश नीति के मूल सिद्धांतों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आएगा। भारत ने हमेशा से पश्चिम एशिया में स्थिरता और शांति का समर्थन किया है, और भारत-इजरायल के बीच व्यापारिक तथा कूटनीतिक चैनल हमेशा खुले और मजबूत बने रहेंगे। इसलिए भारतीय दृष्टिकोण से यह चुनाव सत्ता के समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन भारत-इजरायल की अटूट दोस्ती और रणनीतिक साझेदारी पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।