धर्म

गौरी व्रत 2026: कब है 5 दिनों का महा-पर्व? शिव-पार्वती की कृपा पाने के लिए जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा का महत्व

सनातन धर्म में गौरी व्रत का विशेष महत्व है, जो मुख्य रूप से माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। पांच दिनों तक चलने वाला यह पावन पर्व न केवल सुख-सौभाग्य में वृद्धि करता है, बल्कि कुंवारी कन्याओं को मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त करने का आशीर्वाद भी देता है। साल 2026 में गौरी व्रत कब शुरू हो रहा है और इस दौरान पूजा की पूरी विधि क्या होगी, इसे लेकर भक्तों में खासा उत्साह है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन पांच दिनों में की गई विशेष पूजा से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

गौरी व्रत 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां और शुभ मुहूर्त

गौरी व्रत का आरंभ आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से होता है। पंचांग के अनुसार, साल 2026 में यह व्रत 24 जुलाई से शुरू होकर 28 जुलाई तक चलेगा। पांच दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में प्रतिदिन देवी गौरी (माता पार्वती) के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। पूजा के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना गया है। भक्त सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं और विधि-विधान से शिव-पार्वती का अभिषेक करते हैं। शुभ मुहूर्त की बात करें तो, प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में की गई पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है, जबकि शाम के समय आरती करना अनिवार्य है।

क्यों खास है ये 5 दिन? जानें व्रत का महत्व

गौरी व्रत का सीधा संबंध माता पार्वती की उस कठोर तपस्या से है, जिसके माध्यम से उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था। इन पांच दिनों में महिलाएं और कन्याएं उपवास रखकर 'गौरी पूजन' करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। जो कन्याएं विवाह योग्य हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत प्रभावशाली माना जाता है। वहीं, विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु और परिवार की उन्नति के लिए यह अनुष्ठान करती हैं। पांचवें दिन व्रत का समापन दान-पुण्य और विशेष भोग अर्पित करके किया जाता है।

पूजा की विधि और समापन के नियम

गौरी व्रत के दौरान सात्विक भोजन और संयम का पालन करना बहुत आवश्यक है। पहले दिन संकल्प लेकर पूजा की शुरुआत की जाती है। भक्त घर के मंदिर में माता पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर 'गौरी-शंकर' की पूजा करते हैं। पांचों दिन उन्हें अक्षत, चंदन, सिंदूर, फूल और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। समापन वाले दिन, यानी 28 जुलाई को, विशेष हवन और ब्राह्मण भोज का आयोजन किया जाता है। इस दिन सुहागिनों को सुहाग की वस्तुएं दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। यह पांच दिवसीय महापर्व भक्ति और विश्वास का एक अनूठा संगम है, जो श्रद्धालुओं को शिव-पार्वती का आशीर्वाद दिलाने में सक्षम है।

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