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घर या जमीन खरीदते समय न करें जल्दबाजी: जीवन भर की कमाई लगाने से पहले जरूर जांच लें ये 5 दस्तावेज, वरना हो सकता है भारी कानूनी और वित्तीय नुकसान

अपना एक सपनों का आशियाना होना या भविष्य के लिए जमीन खरीदना हर परिवार का सबसे बड़ा सपना होता है। लोग अपनी जिंदगी भर की मेहनत की कमाई, रिटायरमेंट फंड और यहां तक कि 20 से 30 साल के होम लोन का बोझ उठाकर रियल एस्टेट में निवेश करते हैं। हालांकि, भारतीय रियल एस्टेट बाजार में जितनी संभावनाएं हैं, कानूनी और वित्तीय जोखिम भी उतने ही गहरे हैं। अक्सर खरीदार बिल्डर के आकर्षक ब्रोशर, सैंपल फ्लैट की चकाचौंध या डिस्काउंट ऑफर्स के दबाव में आकर बिना उचित जांच-पड़ताल (Due Diligence) के टोकन मनी दे बैठते हैं या एग्रीमेंट साइन कर लेते हैं। अधूरी जांच के कारण कई बार लोग अवैध कॉलोनियों, विवादित जमीनों, बंधक रखी गई संपत्तियों या कई खरीदारों को बेचे जा चुके फ्लैट्स के जाल में फंस जाते हैं। किसी भी संपत्ति का सौदा पक्का करने और गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखने के लिए ये 5 बुनियादी और अनिवार्य जांच अवश्य करनी चाहिए।

1. टाइटल डीड और पिछले 30 वर्षों का मालिकाना हक (Chain of Title)

प्रॉपर्टी खरीदते समय सबसे पहला और अनिवार्य कदम संपत्ति के मालिकाना हक की कानूनी जांच करना है। विक्रेता या बिल्डर से 'ओरिजिनल टाइटल डीड' (मूल विक्रय पत्र) की मांग करें और यह सुनिश्चित करें कि संपत्ति बेचने वाले के नाम पर कानूनी रूप से दर्ज है। केवल वर्तमान डीड देखना ही काफी नहीं होता, बल्कि पिछले कम से कम 30 वर्षों की 'मदर डीड' और स्वामित्व की पूरी श्रृंखला (Chain of Title) की जांच किसी अनुभवी प्रॉपर्टी वकील से करानी चाहिए। यह पड़ताल करना बेहद जरूरी है कि जमीन किसी संयुक्त परिवार की पैतृक संपत्ति तो नहीं है, जिसमें किसी अन्य वारिस का हक बकाया हो। यदि विक्रेता 'पावर ऑफ अटॉर्नी' (GPA) के आधार पर संपत्ति बेच रहा है, तो विशेष सावधानी बरतें क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार केवल जीपीए के जरिए संपत्ति का पूर्ण मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता; उसके लिए रजिस्टर्ड सेल डीड अनिवार्य है।

2. राज्य रेरा पोर्टल पर प्रोजेक्ट का एक्टिव रजिस्ट्रेशन और मंजूरियां

रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम यानी 'रेरा' (RERA) खरीदारों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया सबसे प्रभावी कानून है। यदि आप किसी अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट या नई टाउनशिप में फ्लैट या प्लॉट खरीद रहे हैं, तो सबसे पहले उस राज्य के आधिकारिक रेरा पोर्टल पर जाकर प्रोजेक्ट का यूनिक रेरा रजिस्ट्रेशन नंबर सत्यापित करें। रेरा वेबसाइट पर डेवलपर द्वारा घोषित पजेशन की अंतिम तारीख, निर्माण का वर्तमान चरण, मंजूर लेआउट प्लान और प्रोजेक्ट के खिलाफ दर्ज शिकायतों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक होता है। इसके साथ ही नगर निगम या स्थानीय विकास प्राधिकरण (जैसे DDA, BDA, YEIDA, LDA आदि) द्वारा जारी अप्रूव्ड बिल्डिंग प्लान, कमेंसमेंट सर्टिफिकेट (CC) और तैयार प्रोजेक्ट्स के लिए ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) व कंप्लीशन सर्टिफिकेट का मिलान करें। बिना ओसी और सीसी वाली इमारतों में बिजली, पानी के वैध कनेक्शन कटने और सीलिंग का गंभीर खतरा बना रहता है।

3. भारमुक्त प्रमाणपत्र (Encumbrance Certificate) और बैंक लोन स्टेटस

प्रॉपर्टी किसी बैंक में बंधक तो नहीं रखी गई है या उस पर कोई कानूनी मुकदमा (Litigation) लंबित तो नहीं है, यह जानने के लिए सब-रजिस्ट्रार कार्यालय से 'एनकंबरेंस सर्टिफिकेट' (EC / भारमुक्त प्रमाणपत्र) निकलवाना अनिवार्य है। फॉर्म 15 (Form 15) के तहत जारी ईसी पिछले 15 से 30 वर्षों के दौरान संपत्ति पर हुए सभी वित्तीय और कानूनी लेन-देन, बंधक (Mortgage), बिक्री या कुर्की का आधिकारिक ब्योरा देता है। यदि संपत्ति पर किसी बैंक का लोन चल रहा है, तो विक्रेता से लोन का आधिकारिक आउटस्टैंडिंग स्टेटस और 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) प्राप्त करें। इसके अतिरिक्त, यदि देश के 3 से 4 बड़े राष्ट्रीयकृत या अग्रणी कमर्शियल बैंक उस प्रोजेक्ट को होम लोन देने के लिए पहले से मंजूरी दे चुके हैं, तो यह उस संपत्ति की कानूनी वैधता का एक सकारात्मक प्राथमिक संकेत माना जाता है।

4. भूमि उपयोग (Land Use) और मास्टर प्लान का जमीनी मिलान

प्लॉट या फार्महाउस खरीदते समय सबसे बड़ा धोखा 'लैंड यूज' (भूमि उपयोग) को लेकर होता है। कई बार ग्रामीण या बाहरी इलाकों में डेवलपर्स कृषि भूमि (Agricultural Land) को बिना आधिकारिक अनुमति के छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर अनधिकृत कॉलोनी के रूप में बेच देते हैं। हमेशा सुनिश्चित करें कि खरीदी जा रही जमीन का विधिवत गैर-कृषि (Non-Agricultural / NA) रूपांतरण हो चुका हो और संबंधित राजस्व विभाग (Revenue Authority) से 143/सीएलयू (CLU – Change of Land Use) का प्रमाण पत्र जारी हो चुका हो। इसके साथ ही स्थानीय शहर के मास्टर प्लान की समीक्षा करें कि वह जमीन किसी प्रस्तावित ग्रीन बेल्ट, बाढ़ क्षेत्र (Flood Plain), राष्ट्रीय राजमार्ग या मेट्रो कॉरिडोर के चौड़ीकरण क्षेत्र में तो नहीं आ रही है। अगर जमीन पर्यावरण या वन विभाग के नियमों का उल्लंघन करती है, तो भविष्य में निर्माण पर बुलडोजर चलने का खतरा हमेशा बना रहता है।

5. कारपेट एरिया का गणित, अतिरिक्त छिपे खर्चे और बिल्डर का ट्रैक रिकॉर्ड

खरीदारी के दौरान बजट बनाते समय केवल बेसिक सेलिंग प्राइस (BSP) को ही कुल लागत न मानें। कई बिल्डर्स सुपर बिल्ट-अप एरिया बताकर फ्लैट बेचते हैं, जिसमें लिफ्ट, लॉबी, स्विमिंग पूल और सीढ़ियों का क्षेत्र भी जुड़ा होता है, जिससे वास्तविक रहने लायक जगह (Carpet Area) 25 से 30 फीसदी तक कम हो जाती है। रेरा के नियमों के अनुसार डेवलपर को केवल शुद्ध कारपेट एरिया के आधार पर ही कीमत वसूलने का अधिकार है। इसके अलावा, एग्रीमेंट साइन करने से पहले छिपे हुए शुल्कों की पूरी सूची मांगें, जिसमें प्रेफरेंशियल लोकेशन चार्ज (PLC), इंटरनल डेवलपमेंट चार्ज (IDC), क्लब मेंबरशिप, पावर बैकअप चार्ज, एडवांस मेंटेनेंस (IFMS), पार्किंग शुल्क, 18% जीएसटी और 5% से 7% स्टाम्प ड्यूटी व रजिस्ट्रेशन फीस शामिल हैं। अंत में, डेवलपर की वित्तीय स्थिति और उसके द्वारा पहले डिलीवर किए गए पुराने प्रोजेक्ट्स के खरीदारों से फीडबैक लेकर ही अपने जीवन की सबसे बड़ी डील को अंतिम रूप दें।

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