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जाली हस्ताक्षर केस में घिरे अभिषेक और कुणाल! CID के तीखे सवालों में फंसे तो जा सकती है सांसदी की कुर्सी

पश्चिम बंगाल की राजनीति और कानूनी गलियारे से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें आने वाले दिनों में बेहद बढ़ने वाली हैं। हाई-प्रोफाइल जाली हस्ताक्षर (Forgery Case) मामले की जांच कर रही राज्य की जांच एजेंसी सीआईडी (CID) अब इस मामले की तह तक जाने के लिए पूरी तरह तैयार है। सूत्रों के मुताबिक, इस केस के मुख्य कड़ियों को जोड़ने के लिए अभिषेक बनर्जी और पार्टी के तेजतर्रार नेता कुणाल घोष का आमना-सामना (Confrontation) कराया जा सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि जांच के दौरान गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो अभिषेक बनर्जी की संसद सदस्यता पर भी खतरा मंडरा सकता है।

क्या है पूरा जाली हस्ताक्षर मामला जिसने हिला दी बंगाल की सियासत

इस पूरे विवाद की शुरुआत एक बेहद गोपनीय और महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज पर किए गए कथित जाली हस्ताक्षर से हुई है। आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों के हित साधने के लिए एक आधिकारिक लेटरहेड और दस्तावेजों पर फर्जी तरीके से साइन किए गए थे, जिसकी भनक लगते ही विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया। कोर्ट के कड़े रुख के बाद इस संवेदनशील मामले की जांच सीआईडी को सौंपी गई थी। अब तक की जांच में कई ऐसे चौंकाने वाले सुराग हाथ लगे हैं, जो सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के शीर्ष नेताओं के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। इसी सिलसिले में सीआईडी ने गवाहों और बयानों के आधार पर पूछताछ का नया खाका तैयार किया है।

कुणाल घोष और अभिषेक बनर्जी के बयानों में विरोधाभास के बाद बढ़ा सस्पेंस

सीआईडी सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, इस मामले में पहले हुई प्राथमिक पूछताछ के दौरान कुणाल घोष और अन्य संबंधित लोगों के बयानों में भारी विरोधाभास (Contradiction) देखने को मिला है। बयानों के इस बड़े अंतर को पाटने के लिए ही जांच अधिकारियों ने दोनों बड़े नेताओं को एक साथ बिठाकर पूछताछ करने का फैसला किया है। इस दौरान सीआईडी की स्पेशल टीम दस्तावेजों की फॉरेंसिक रिपोर्ट और डिजिटल सबूतों को सामने रखकर सवाल-जवाब करेगी। राजनीतिक पंडितों की मानें तो कुणाल घोष के तेवर पिछले कुछ समय से जिस तरह बदले-बदले नजर आए हैं, उसे देखते हुए यह आमना-सामना तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक नया सियासी तूफान खड़ा कर सकता है।

सांसदी की कुर्सी पर मंडराया संकट और कानूनी पेचदगियां

यह मामला सिर्फ एक सामान्य धोखाधड़ी या जालसाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार जनप्रतिनिधित्व कानून (Representation of the People Act) से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। यदि सीआईडी की चार्जशीट और कोर्ट के ट्रायल में जाली हस्ताक्षर करने या इस साजिश में शामिल होने का आरोप कानूनी रूप से साबित हो जाता है, तो दोषी पाए जाने पर गंभीर सजा का प्रावधान है। देश के कड़े कानूनों के मुताबिक, अगर किसी मौजूदा सांसद को दो साल या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसकी लोकसभा सदस्यता (सांसदी की कुर्सी) तुरंत प्रभाव से रद्द हो सकती है। यही वजह है कि टीएमसी का लीगल सेल इस पूरे मामले पर चौबीसों घंटे पैनी नजर बनाए हुए है।

कोलकाता से दिल्ली तक मची खलबली, विपक्ष ने साधा निशाना

सीआईडी की इस बढ़ती रफ्तार के बाद कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार पर चौतरफा हमला शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य की जांच एजेंसियां पहले इस मामले को दबाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन सबूत इतने पुख्ता हैं कि अब कार्रवाई करना मजबूरी बन गया है। बहरहाल, अगले कुछ घंटे पश्चिम बंगाल की राजनीति का भविष्य तय करने वाले साबित हो सकते हैं, क्योंकि सीआईडी के सवालों के जवाबों पर ही अब कई दिग्गजों का सियासी करियर टिका हुआ है।

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