‘द वन’ के गाने से सुर्खियों में आई छठ पूजा: कौन हैं छठी मैया और नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक 4 दिवसीय महापर्व का पूरा महत्व

बॉलीवुड अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा और अभिनेत्री तमन्ना भाटिया की आगामी बहुचर्चित फिल्म 'द वन' का नया भक्ति गीत 'छठी मैया' रिलीज होते ही संगीत चार्ट्स और सोशल मीडिया पर छा गया है। इस कर्णप्रिय और भावुक गीत ने पूरे देश के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर लोक आस्था के सबसे बड़े महापर्व छठ पूजा के प्रति लोगों की उत्सुकता को कई गुना बढ़ा दिया है। सनातन संस्कृति में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला छठ पर्व केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, प्रत्यक्ष देवता भगवान भुवन भास्कर सूर्य और उनकी मानस बहन छठी मैया के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अद्वितीय आध्यात्मिक उत्सव है। चार दिनों तक चलने वाला यह कठिन व्रत संतान की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य, आरोग्यता और कुल की सुख-समृद्धि की कामना के लिए पूर्ण निष्ठा, शुचिता और कठोर नियमों के साथ संपन्न किया जाता है।
कौन हैं छठी मैया, पुराणों में वर्णित ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और देवसेना का दिव्य स्वरूप
छठ महापर्व के केंद्र में छठी मैया की आराधना प्रमुख रूप से विद्यमान है। सनातन धर्मग्रंथों, विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड और स्कंद पुराण में छठी मैया के प्राकट्य और उनके अलौकिक प्रभाव का सविस्तार वर्णन मिलता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, छठी मैया सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं, जिन्हें मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण 'षष्ठी देवी' या लोकभाषा में 'छठी मैया' के नाम से संबोधित किया जाता है। देवसेना के रूप में पूजित माता षष्ठी को देवों के सेनापति भगवान कार्तिकेय की शक्ति और प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य नारायण की बहन भी माना गया है।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं हो रही थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, जिसके फलस्वरूप रानी मालिनी ने एक मृत शिशु को जन्म दिया। राजा अत्यंत शोक में डूब गए और अपने प्राण त्यागने का प्रयास करने लगे। उसी क्षण आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान उतरा, जिसमें भगवती षष्ठी देवी प्रकट हुईं। देवी ने बालक को स्पर्श कर जीवित कर दिया और राजा से कहा कि जो भी मनुष्य मेरी पूजा करेगा, वह दीर्घायु, गुणवान और यशस्वी संतान प्राप्त करेगा। तभी से संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और वंश वृद्धि के लिए षष्ठी तिथि को छठी मैया के पूजन का विधान अनंत काल से अनवरत चला आ रहा है।
नहाय-खाय से आध्यात्मिक शुद्धि: 13 नवंबर को कद्दू-भात के साथ शुरू होगा महापर्व
छठ महापर्व का प्रथम दिन 'नहाय-खाय' के रूप में मनाया जाता है, जो शारीरिक और आत्मिक शुद्धि का आधार बनता है। वर्ष 2026 में नहाय-खाय की शुरुआत शुक्रवार, 13 नवंबर को होगी। इस दिन व्रती प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों, सरोवरों या गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल से स्नान करते हैं। इसके उपरांत स्वच्छ अथवा नए वस्त्र धारण किए जाते हैं।
नहाय-खाय के दिन भोजन बनाने और ग्रहण करने के अत्यंत कड़े नियम होते हैं। इस दिन मिट्टी के नए चूल्हे या पीतल के बर्तनों में पूरी शुद्धता और स्वच्छता के साथ सेंधा नमक, गाय का शुद्ध घी, अरवा चावल (भात), चने की दाल और देसी घी में बनी कद्दू (लौकी या घिया) की सात्विक सब्जी बनाई जाती है। भोजन में प्याज और लहसुन का प्रयोग पूरी तरह वर्जित रहता है। पहले व्रती श्रद्धापूर्वक इस सात्विक प्रसाद को ग्रहण करते हैं, जिसके बाद परिवार के अन्य सदस्य भोजन करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य व्रत के लिए शरीर को हल्का, निरोगी और मानसिक रूप से एकाग्र बनाना होता है।
खरना की शाम से 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत: 14 नवंबर को बनेगा गुड़ की खीर का महाप्रसाद
महापर्व के दूसरे दिन को 'खरना' कहा जाता है, जो शनिवार, 14 नवंबर 2026 को संपन्न होगा। खरना के दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम के समय पूजा की विशेष तैयारी करते हैं। इस दिन सूर्यास्त के पश्चात आम की सूखी लकड़ियों और मिट्टी के नए चूल्हे पर मिट्टी के पात्र में नए चावल, गाय के ताजे दूध और शुद्ध गुड़ से बनी 'रसियाव' (खीर) तथा गेहूं के आटे की सात्विक रोटियां तैयार की जाती हैं।
इसके बाद एकांत पवित्र कक्ष में केले के पत्ते पर इस महाप्रसाद को रखकर भगवान सूर्य और छठी मैया को नैवेद्य अर्पित किया जाता है। धूप, दीप और कर्पूर से विधिपूर्वक पूजा अर्चना संपन्न करने के बाद व्रती इस खीर और रोटी के प्रसाद को ग्रहण करते हैं। व्रती के प्रसाद ग्रहण करते समय घर में पूर्ण शांति बनाए रखी जाती है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के साथ ही व्रती का 36 घंटे का अखंड और अत्यंत कठोर निर्जला उपवास शुरू हो जाता है, जिसमें पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती।
डूबते हुए सूर्य को संध्या अर्घ्य: 15 नवंबर को सूप और दउरा लेकर घाटों पर उमड़ेगा आस्था का सैलाब
छठ महापर्व का तीसरा दिन सबसे भव्य और भावनात्मक रूप से समृद्ध माना जाता है, जिसे 'संध्या अर्घ्य' या संझिया घाट कहा जाता है। यह अनुष्ठान रविवार, 15 नवंबर 2026 की शाम को होगा। इस दिन व्रती और उनके परिजन घर पर गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी और शुद्ध घी से छठ का प्रमुख महाप्रसाद 'ठेकुआ' और चावल के लड्डू (कसार) तैयार करते हैं।
शाम के समय बांस से बनी नई टोकरियों (दउरा) और सूप में ठेकुआ, मौसमी फल जैसे नारियल, केला, सिंघाड़ा, अनानास, शरीफा, सूथनी, अदरक और हल्दी का कच्चा पौधा सजाया जाता है। इसके बाद नंगे पांव गाजे-बाजे और पारंपरिक छठ गीतों के साथ श्रद्धालु नदी, तालाब या जलाशय के घाटों पर पहुंचते हैं। अस्ताचलगामी यानी डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने की यह परंपरा सनातन धर्म की उस महान विचारधारा का प्रतीक है, जो ढलते हुए सूर्य का भी उतना ही सम्मान करती है जितना उगते हुए का। व्रती जल में कमर तक खड़े होकर दूध और गंगाजल से सूर्य देव और छठी मैया को प्रथम अर्घ्य अर्पित करते हैं और संतान की कुशलता की प्रार्थना करते हैं।
उषा अर्घ्य और पारण: 16 नवंबर को उगते सूर्य की वंदना के साथ संपन्न होगी 4 दिवसीय साधना
छठ पूजा का चौथा और अंतिम दिन 'उषा अर्घ्य' या भोर का अर्घ्य कहलाता है, जो सोमवार, 16 नवंबर 2026 की सुबह संपन्न होगा। इस दिन सूर्योदय से पूर्व ही सभी श्रद्धालु और व्रती पुनः जलाशयों और घाटों पर एकत्रित हो जाते हैं।
जैसे ही पूर्व दिशा में लालिमा बिखरती है और भगवान भुवन भास्कर उदयाचल स्वरूप में दर्शन देते हैं, व्रती शीतल जल में खड़े होकर तांबे के पात्र या सूप के जरिए भगवान सूर्य को दूसरा अर्घ्य देते हैं। इस दौरान वेदों के सूर्य गायत्री मंत्र और वैदिक ऋचाओं का उच्चारण किया जाता है। सूर्य देव और माता षष्ठी से समस्त चराचर जगत के कल्याण, पर्यावरण संरक्षण, परिवार की समृद्धि और संतान की दीर्घायु का वरदान मांगा जाता है। अर्घ्य अर्पण के बाद घाट पर ही विधिवत आरती उतारी जाती है और व्रती अदरक के टुकड़े, कच्चा चना और थोड़ा सा जल ग्रहण करके अपने 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण करते हैं। इसके पश्चात सभी भक्तों के बीच ठेकुआ और फलों का प्रसाद वितरित किया जाता है।
छठ पूजा 2026 का संपूर्ण कैलेंडर: महत्वपूर्ण तिथियां एक नजर में
| दिन | अनुष्ठान का नाम | निर्धारित तिथि | मुख्य विधि एवं आध्यात्मिक महत्व |
| पहला दिन | नहाय-खाय | 13 नवंबर 2026 (शुक्रवार) | पवित्र स्नान, कद्दू-भात का सात्विक सेवन, आंतरिक शुद्धि |
| दूसरा दिन | खरना | 14 नवंबर 2026 (शनिवार) | गुड़-दूध की खीर (रसियाव) का भोग, 36 घंटे के निर्जला व्रत की शुरुआत |
| तीसरा दिन | संध्या अर्घ्य | 15 नवंबर 2026 (रविवार) | अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य को बांस के सूप से प्रथम अर्घ्य |
| चौथा दिन | उषा अर्घ्य एवं पारण | 16 नवंबर 2026 (सोमवार) | उदयाचल (उगते) सूर्य को अर्घ्य, संतान कल्याण की प्रार्थना व पारण |
छठ पूजा का यह पर्व प्रकृति, सामाजिक समरसता और शुद्धता का सबसे अनुपम उदाहरण है, जहां बिना किसी पुरोहित या आडंबर के समाज का हर वर्ग एक ही घाट पर खड़े होकर सूर्य देव और छठी मैया की उपासना करता है।