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नेपाल की राजनीति में उबाल! बालेन शाह की सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे GenZ युवा, क्या गिर जाएगी नई सरकार

नेपाल के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर बड़ा भूचाल आता दिखाई दे रहा है। केपी शर्मा ओली की सरकार को गिराकर GenZ युवाओं के भारी समर्थन से सत्ता में आए बालेन शाह को प्रधानमंत्री बने अभी महज 104 दिन ही बीते हैं, लेकिन उनके फैसलों के खिलाफ जनआक्रोश चरम पर पहुंच गया है। काठमांडू में नदी किनारे बसी अवैध बस्तियों को हटाने और बुलडोजर कार्रवाई के विरोध में राजधानी की सड़कें सुलग उठी हैं। जिस युवा वर्ग ने बढ़-चढ़कर बालेन शाह को सत्ता की कुर्सी तक पहुँचाया था, आज वही युवा और आंदोलन के प्रमुख चेहरे सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं।

अवैध बस्तियों पर बुलडोजर और बेघर हुए लोग

काठमांडू के पूर्व मेयर रह चुके बालेन शाह लंबे समय से शहर को अतिक्रमण मुक्त करना चाहते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने काठमांडू घाटी में नदी के किनारों पर बनी अवैध बस्तियों को हटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान शुरू कर दिया, जिसके तहत पुलिस और सेना की भारी तैनाती की गई है। इस बेदखली अभियान के दौरान हजारों घर तोड़े जा चुके हैं, जिससे लगभग 3,500 लोग बेघर हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों और स्थानीय लोगों का मुख्य आरोप यह है कि सरकार ने बिना किसी पूर्व पुनर्वास योजना या वैकल्पिक व्यवस्था के उनके आशियाने उजाड़ दिए हैं, जिसके कारण एक व्यक्ति ने आत्मदाह तक कर लिया और अन्य लोगों ने भी ऐसा प्रयास किया।

सरकार बनाने वाले GenZ चेहरों पर पुलिस का शिकंजा

बढ़ते विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए बालेन शाह प्रशासन ने सख्ती बरतनी शुरू कर दी है, जिसके तहत पुलिस ने कई प्रमुख आंदोलनकारियों और GenZ नेताओं को हिरासत में लेना शुरू कर दिया है। विडंबना यह है कि जिन युवा चेहरों ने बालेन शाह को सत्ता तक पहुँचाने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी, आज उन्हें ही पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। रविवार को काठमांडू के माइतीघर में हुए प्रदर्शन के दौरान आंदोलन की अगुआई कर रहे माजिद अंसारी और सरिश्मा थापा को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई में माजिद अंसारी को गंभीर चोटें भी आईं, जिसके बाद जनता और युवाओं का गुस्सा सरकार के प्रति और अधिक भड़क उठा है।

प्रशासन की सख्ती और गहराता राजनीतिक संकट

बालेन शाह सरकार के इस एकतरफा और कठोर कदम ने देश में एक नया राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। सरकार की बेरुखी और पुनर्वास के अभाव में बेघर हुए लोगों की पीड़ा ने आंदोलन को और तेज कर दिया है। प्रदर्शनकारी लगातार मांग कर रहे हैं कि विस्थापितों को तुरंत बसाया जाए और हिरासत में लिए गए युवा नेताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। विश्लेषकों का मानना है कि यदि प्रशासन ने सूझबूझ से काम नहीं लिया और जनता के गुस्से को शांत करने की पहल नहीं की, तो यह जनआक्रोश बालेन शाह की नवनिर्वाचित सरकार के लिए भारी साबित हो सकता है।

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