पजेशन से पहले अंडर-कंस्ट्रक्शन फ्लैट्स बेचकर निवेशक काट रहे मोटा मुनाफा: गुरुग्राम में रीसेल प्रॉपर्टी की मची होड़, मिल रहे मुंहमांगे दाम

देश के प्रमुख टेक और कॉरपोरेट हब गुरुग्राम (Gurugram) का रियल एस्टेट बाजार इन दिनों एक अभूतपूर्व तेजी और 'प्री-पजेशन फ्लिपिंग' (Pre-Possession Flipping) के दौर से गुजर रहा है। पिछले दो से तीन वर्षों में लॉन्च हुए अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रीमियम और लग्जरी आवासीय प्रोजेक्ट्स में फ्लैट बुक कराने वाले शुरुआती निवेशकों की चांदी हो गई है। निर्माण पूरा होने और पजेशन मिलने से पहले ही निवेशक अपने इन फ्लैट्स को रीसेल (असाइनमेंट ट्रांसफर) मार्केट में बेचकर 40 से 80 प्रतिशत और कई प्राइम लोकेशंस पर 100 प्रतिशत से अधिक का अप्रत्याशित मुनाफा अपनी जेब में डाल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, रेडी-टू-मूव या निकट भविष्य में डिलीवर होने वाले घरों की तलाश कर रहे एंड-यूजर्स (घर खरीदार) डेवलपर्स के पास फ्रेश इन्वेंट्री न होने के कारण इन रीसेल प्रॉपर्टीज के लिए मुंहमांगे प्रीमियम दाम चुकाने को तैयार हैं।
द्वारका एक्सप्रेसवे और गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड बने मुनाफे के सबसे बड़े केंद्र
गुरुग्राम के जिन माइक्रो-मार्केट्स में सबसे ज्यादा प्राइस एप्रिसिएशन और रीसेल डिमांड देखी जा रही है, उनमें द्वारका एक्सप्रेसवे (Dwarka Expressway), गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड (Golf Course Extension Road), साउदर्न पेरिफेरल रोड (SPR) और न्यू गुरुग्राम के प्रमुख सेक्टर्स शामिल हैं। रियल एस्टेट कंसल्टेंट्स और मार्केट एनालिस्ट्स के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021-2022 में द्वारका एक्सप्रेसवे के प्राइम सेक्टर्स में जो लग्जरी प्रोजेक्ट्स ₹8,000 से ₹10,000 प्रति वर्ग फीट के रेट पर लॉन्च हुए थे, वर्तमान में उनके भाव रीसेल मार्केट में ₹16,000 से लेकर ₹22,000 प्रति वर्ग फीट के पार पहुंच चुके हैं। जिन निवेशकों ने कंस्ट्रक्शन लिंक्ड प्लान (CLP) के तहत केवल 30 से 40 प्रतिशत पूंजी ही बिल्डर को जमा की थी, वे कुल प्रोजेक्ट कॉस्ट पर मिलने वाले कैपिटल एप्रिसिएशन के दम पर अपनी लगाई गई वास्तविक इक्विटी पर दोगुना से तीन गुना तक रिटर्न (RoI) हासिल कर रहे हैं।
नए प्रोजेक्ट्स में इन्वेंट्री की कमी और एंड-यूजर्स की बढ़ती मांग
अंडर-कंस्ट्रक्शन फ्लैट्स की रीसेल में इस कदर उछाल आने का मुख्य कारण बाजार में अच्छी और भरोसेमंद डेवलपर्स की संपत्तियों की भारी किल्लत है। देश के शीर्ष लिस्टेड और ए-ग्रेड बिल्डर्स जैसे डीएलएफ, गोदरेज प्रॉपर्टीज, शोभा, सिग्नेचर ग्लोबल और एम3एम के नए प्रोजेक्ट्स लॉन्च के कुछ ही घंटों या दिनों के भीतर पूरी तरह सोल्ड-आउट हो रहे हैं। ऐसे में जिन वास्तविक घर खरीदारों (End-Users) को नए लॉन्च में अपनी पसंद का यूनिट या फ्लोर नहीं मिल पाता, वे उन अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स का रुख करते हैं जो 1 से 2 साल के भीतर डिलीवरी के करीब हैं। खरीदार बिल्डर के 4 से 5 साल के लंबे इंतजार के जोखिम से बचने के लिए मौजूदा अलॉटी (शुरुआती निवेशक) को अतिरिक्त प्रीमियम देकर अलॉटमेंट अपने नाम ट्रांसफर करवा रहे हैं।
असाइनमेंट ट्रांसफर: पजेशन से पहले कैसे होती है प्रॉपर्टी की बिक्री?
रियल एस्टेट कानून और प्रक्रियाओं के तहत जब किसी प्रोजेक्ट में रजिस्ट्री (कन्वेयंस डीड) नहीं हुई होती, तब प्रॉपर्टी की रीसेल 'असाइनमेंट ट्रांसफर' (Assignment Transfer / Nomination Sale) के जरिए की जाती है। इसमें मूल खरीदार, नया खरीदार और बिल्डर के बीच एक त्रिपक्षीय अनुबंध (Tripartite Agreement) या एंडोर्समेंट लेटर निष्पादित होता है। नया खरीदार मूल खरीदार द्वारा बिल्डर को चुकाई गई कुल किस्त राशि के साथ-साथ तय प्रीमियम (मुनाफा) का भुगतान करता है। इसके बाद बिल्डर के बहीखातों में खरीदार का नाम आधिकारिक रूप से बदल दिया जाता है और शेष किस्तों का भुगतान नया खरीदार निर्माण की प्रगति के अनुसार करता है।
ट्रांसफर फीस और इनकम टैक्स नियमों का ध्यान रखना जरूरी
अंडर-कंस्ट्रक्शन फ्लैट को पजेशन से पहले बेचने पर होने वाले भारी मुनाफे के साथ-साथ निवेशकों को कानूनी और टैक्स देनदारियों का भी विशेष ध्यान रखना पड़ता है। अधिकांश डेवलपर्स यूनिट ट्रांसफर करने के एवज में ₹100 से ₹350 प्रति वर्ग फीट तक का 'एडमिनिस्ट्रेटिव / ट्रांसफर चार्ज' वसूलते हैं। इसके अलावा, आयकर अधिनियम के तहत यदि किसी प्रॉपर्टी या राइट टू एक्वायर (Right to Acquire) को खरीदने के 24 महीने (2 साल) के भीतर बेचा जाता है, तो उस मुनाफे पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (STCG) लगता है, जो निवेशक के इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होता है। वहीं, 24 महीने के बाद बेचने पर यह लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) के दायरे में आता है, जिस पर 12.5% की दर से टैक्स देय होता है।
रीसेल प्रॉपर्टी खरीदते समय नए खरीदार बरतें ये जरूरी सावधानियां
MoneyTree Realty
पजेशन से पहले रीसेल में अंडर-कंस्ट्रक्शन फ्लैट खरीदने वाले नए खरीदारों को जल्दबाजी या फोमो (FOMO – छूट जाने का डर) में सौदा करने से बचना चाहिए। किसी भी यूनिट को फाइनल करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि प्रोजेक्ट हरियाणा रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (HRERA) से पंजीकृत है और निर्माण कार्य समय-सीमा के अनुरूप चल रहा है या नहीं। इसके साथ ही बिल्डर से 'नो ड्यूज सर्टिफिकेट' (NOC), मूल अलॉटमेंट लेटर, बिल्डर-बायर एग्रीमेंट और बैंक लोन की स्थिति की गहन पड़ताल किसी कानूनी विशेषज्ञ या प्रॉपर्टी वकील से कराना सुरक्षित भविष्य के लिए बेहद अनिवार्य है।