पाकिस्तान में मेडिकल लापरवाही का महापाप: सामान्य इलाज के बाद दर्जनों मासूम बच्चे हुए HIV पॉजिटिव

पाकिस्तान के स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली और आपराधिक लापरवाही ने दर्जनों मासूम बच्चों और उनके परिवारों की जिंदगी को हमेशा-हमेशा के लिए अंधकार में धकेल दिया है। देश के विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में मौसमी बुखार, खांसी या सामान्य बाल रोगों का इलाज कराने गए दर्जनों बच्चे कुछ ही हफ्तों और महीनों के भीतर ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी (HIV) पॉजिटिव पाए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान एनपीआर (NPR) की एक सनसनीखेज खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, नियमित मेडिकल चेकअप और सामान्य क्लिनिकल प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद बच्चों के शरीर में इस जानलेवा वायरस की पुष्टि होने से पूरे देश में भारी आक्रोश और खलबली मच गई है।
पीड़ित बच्चों के माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है और वे समझ नहीं पा रहे हैं कि जिस मासूम बच्चे को उन्होंने साधारण बीमारी के इलाज के लिए डॉक्टर के पास भेजा था, वह इस लाइलाज बीमारी का शिकार कैसे हो गया। प्रभावित माता-पिता का स्पष्ट कहना है कि उनके परिवारों में किसी को भी यह संक्रमण नहीं था और न ही बच्चों को किसी अन्य बाहरी स्रोत से इस वायरस के संपर्क में आने की कोई गुंजाइश थी। पीड़ित परिवारों ने स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों, नर्सिंग होम्स और सरकारी अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल (Infection Control Protocol) के पूरी तरह ध्वस्त होने पर सीधे सवाल खड़े किए हैं।
इस्तेमाल की गई सिरिंज और सुइयों का दोबारा उपयोग: लालच और अनदेखी ने ली 6 मासूमों की जान
इस खौफनाक त्रासदी के पीछे सबसे बड़ी और डरावनी वजह स्वास्थ्य केंद्रों में अपनाए जाने वाले असुरक्षित मेडिकल तौर-तरीके बनकर सामने आ रहे हैं। एनपीआर से बातचीत करते हुए कई पीड़ित माता-पिता ने रोंगटे खड़े कर देने वाले आरोप लगाए हैं। परिजनों का कहना है कि कई क्लीनिकों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ग्लूकोज चढ़ाने (IV Treatment) और सामान्य इंजेक्शन लगाने के दौरान एक ही डिस्पोजेबल सिरिंज और सुई का कई-कई मरीजों पर बार-बार इस्तेमाल किया जाता रहा है। मेडिकल कचरे के प्रबंधन और सिंगल-यूज सिरिंज के कड़े नियमों को ताक पर रखकर चंद पैसों के लालच या आपराधिक लापरवाही में इस्तेमाल की गई सुइयों से बच्चों को दवाएं दी गईं।
यद्यपि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हर एक मामले में संक्रमण के सटीक स्रोत का पता लगाने के लिए गहन एपिडेमियोलॉजिकल जांच की आवश्यकता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह बयां करती है कि सुइयों का पुन: उपयोग ही इस व्यापक संक्रमण की सबसे प्रत्यक्ष कड़ी प्रतीत होता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस खौफनाक लापरवाही के चलते अब तक कम से कम छह मासूम बच्चों ने तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया है। जिन बच्चों में एचआईवी की पुष्टि हुई है, उनकी पूरी जिंदगी अब जीवनरक्षक दवाओं और अस्पतालों के फेरों में बंध गई है। एचआईवी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) को पूरी तरह तबाह कर देता है, जिससे सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन जाते हैं। हालांकि एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) से वायरस को नियंत्रित रखा जा सकता है, लेकिन इस बीमारी का जड़ से कोई इलाज उपलब्ध नहीं है।
परिवारों पर टूटा मुसीबतों का पहाड़: इलाज का भारी खर्च और सामाजिक बहिष्कार का दोहरा दंश
पाकिस्तान जैसे आर्थिक रूप से बदहाल देश में किसी बच्चे का एचआईवी पॉजिटिव होना केवल एक चिकित्सीय संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार के लिए एक अंतहीन सामाजिक और आर्थिक प्रताड़ना बन जाता है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए लगातार होने वाले महंगे ब्लड टेस्ट, वायरल लोड की निगरानी, महंगी एंटीरेट्रोवायरल दवाइयों की व्यवस्था और बड़े शहरों के अस्पतालों के बार-बार चक्कर लगाना आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद कर देने वाला साबित हो रहा है। अधिकांश पीड़ित परिवार पहले से ही बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब उन पर इस गंभीर बीमारी के इलाज का असहनीय बोझ आ पड़ा है।
इसके अलावा, पाकिस्तानी समाज में एचआईवी और एड्स को लेकर व्याप्त गहरे अंधविश्वास, अशिक्षा और सामाजिक कलंक (Stigma) ने इन परिवारों का जीना दूभर कर दिया है। बच्चों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद कई परिवारों को अपने ही रिश्तेदारों और मोहल्ले के लोगों द्वारा सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। स्कूलों और खेल के मैदानों से इन बच्चों को अलग-थलग किए जाने का डर माता-पिता को अंदर से खाए जा रहा है। बदनामी और उपेक्षा के इसी दोहरे खौफ के बीच अब आक्रोशित माता-पिता एकजुट होकर सरकारी तंत्र से न्याय, पारदर्शी जांच और जिम्मेदार डॉक्टरों व स्टाफ के खिलाफ हत्या के समान सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
स्वास्थ्य केंद्रों की सघन जांच और सख्त मेडिकल प्रोटोकॉल लागू करने की चौतरफा मांग
इस मानवीय त्रासदी के सार्वजनिक होने के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बाल अधिकार संगठनों और नागरिक समाज ने पाकिस्तान सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है। कार्यकर्ताओं की मांग है कि देश भर के सभी निजी क्लीनिकों, नर्सिंग होम्स और सरकारी अस्पतालों में उपयोग किए जाने वाले मेडिकल उपकरणों की सघन फॉरेंसिक और सुरक्षा ऑडिट कराई जाए। विशेष रूप से डिस्पोजेबल सिरिंज, आईवी कैनुला, ब्लड ट्रांसफ्यूजन किट और सर्जिकल औजारों के एक बार इस्तेमाल के बाद अनिवार्य रूप से नष्ट करने के नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
पाकिस्तान में स्वास्थ्य क्षेत्र में नियमन की कमी और झोलाछाप डॉक्टरों (Quacks) के अनियंत्रित जाल ने पहले भी इस तरह के बड़े एचआईवी आउटब्रेक को जन्म दिया है, लेकिन पुरानी गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा गया। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थू-थू होने के बाद क्या पाकिस्तानी हुकूमत दोषी स्वास्थ्य केंद्रों के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाती है या फिर हमेशा की तरह गरीब और असहाय मासूमों की यह चीखें भी फाइलों में दबा दी जाएंगी।