धर्म

बंगाली महिलाएं दुर्गा पूजा और हर शुभ अवसर पर क्यों निकालती हैं ‘उलू ध्वनि’, 99% लोग नहीं जानते इसके पीछे का यह गहरा रहस्य

भारतीय सनातन संस्कृति और विभिन्न क्षेत्रीय परंपराओं में ऐसे अनगिनत रीति-रिवाज और अनुष्ठान छिपे हैं, जिनका धार्मिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से बहुत बड़ा महत्व होता है। जब बात पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और वहां के सबसे बड़े महापर्व दुर्गा पूजा (Durga Puja 2026) की आती है, तो ढोल-ताशों की गड़गड़ाहट और शंखनाद के साथ-साथ एक और बेहद खास आवाज हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचती है। वह आवाज है बंगाली महिलाओं द्वारा निकाली जाने वाली 'उलू ध्वनि' (Ulu Dhwani)। बंगाल में दुर्गा पूजा हो, किसी की शादी हो, गृह प्रवेश हो या कोई भी अन्य मांगलिक अवसर, महिलाओं द्वारा मुंह से निकाली जाने वाली यह तेज और अनोखी ध्वनि इस बात का प्रतीक होती है कि वहां किसी शुभ कार्य का शुभारंभ हो रहा है। अधिकांश लोग इस ध्वनि को केवल एक परंपरा मान लेते हैं, लेकिन इसके पीछे के रहस्य और वैज्ञानिक-आध्यात्मिक महत्व से बहुत कम लोग वाकिफ हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि बंगाली महिलाएं हर शुभ अवसर पर उलू ध्वनि क्यों निकालती हैं और इसके पीछे का असली रहस्य क्या है।

क्या होती है 'उलू ध्वनि' और कैसे निकाली जाती है यह अनोखी आवाज

'उलू ध्वनि' एक प्रकार की मौखिक परंपरा (Oral Tradition) है, जिसे दुनिया भर की कई प्राचीन संस्कृतियों में 'उल्युलेशन' (Ulation) के नाम से भी जाना जाता है। बंगाल में जब भी कोई धार्मिक उत्सव, पूजा-पाठ या खुशी का मौका आता है, तो महिलाएं अपनी जीभ को बहुत तेजी से दाएं-बाएं घुमाते हुए मुंह से एक गूंजती हुई तेज आवाज निकालती हैं, जिसे उलू ध्वनि कहा जाता है।

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इस ध्वनि को जीत, उल्लास, उत्सव और वातावरण से हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने का माध्यम माना जाता है। बंगाली संस्कृति में यह माना जाता है कि इस ध्वनि के बिना कोई भी शुभ कार्य और धार्मिक अनुष्ठान अधूरा ही रहता है। जब पंडालों में मां दुर्गा की आराधना के दौरान शंख और घंटियों के साथ उलू ध्वनि गूंज उठती है, तो पूरा वातावरण भक्तिमय और ऊर्जा से भर जाता है।

उलू ध्वनि: शुभकामनाओं और सकारात्मक ऊर्जा का सबसे बड़ा प्रतीक

बंगाल की लोक संस्कृति में ऐसा विश्वास किया जाता है कि जब महिलाएं उलू ध्वनि निकालती हैं, तो वे इसके माध्यम से ब्रह्मांड में सकारात्मकता और शुभकामनाओं का संचार करती हैं। यह ध्वनि केवल एक आवाज नहीं है, बल्कि यह घर-परिवार और समाज के लिए मंगलकामना करने का एक अनूठा तरीका है।

जब किसी नए कार्य की शुरुआत होती है, तो सबसे पहले मंदिर या पूजा स्थल पर जाकर मां दुर्गा का आह्वान करते हुए इस ध्वनि को निकाला जाता है। इसके बाद उस स्थान पर भी यह ध्वनि गूंजती है जहां मुख्य अनुष्ठान हो रहा होता है। ऐसा माना जाता है कि इस ध्वनि के कंपन (Vibrations) से आस-पास का पूरा वातावरण शुद्ध हो जाता है और वहां मौजूद सभी लोगों के भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करती है उलू ध्वनि

सनातन परंपरा में बुरी नजर (Evil Eye) और नकारात्मक शक्तियों से बचने के लिए कई उपाय किए जाते हैं। बंगाली समाज में उलू ध्वनि को एक बहुत ही शक्तिशाली सुरक्षा कवच माना गया है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इस ध्वनि की जो विशेष आवृत्ति (Frequency) होती है, वह किसी भी प्रकार की बुरी नजर, बाधा या नकारात्मक ऊर्जा को घर और परिवार के सदस्यों के पास फटकने नहीं देती है।

यही वजह है कि विवाह के समय जब दूल्हा-दुल्हन का प्रवेश होता है, या जब कोई नई बहू पहली बार गृह प्रवेश करती है, तो उस विशेष क्षण को बुरी नजर से बचाने के लिए उलू ध्वनि जरूर निकाली जाती है। यह ध्वनि यह सुनिश्चित करती है कि नए सफर की शुरुआत पूरी तरह सुरक्षित और मंगलमय हो।

महिलाओं द्वारा शुरू की जाने वाली इस परंपरा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

उलू ध्वनि निकालने की भी एक निश्चित और अनुशासित परंपरा होती है। किसी भी शुभ अवसर पर इस ध्वनि की शुरुआत आमतौर पर परिवार या समाज की सबसे बुजुर्ग और सम्मानित महिला द्वारा की जाती है। जब वह अपनी आवाज से इसकी शुरुआत करती हैं, तो तुरंत उनके साथ मौजूद अन्य महिलाएं भी एक सुर में अपनी जीभ को थिरकाते हुए इस ध्वनि में शामिल हो जाती हैं।

यह दृश्य किसी सामूहिक एकता और शक्ति के प्रदर्शन जैसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है मानो सभी महिलाएं मिलकर मां शक्ति से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना कर रही हों। दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों में जब सिंदूर खेला या धुनुची नाच जैसी रस्में होती हैं, तब उलू ध्वनि का गूंजना इस पावन पर्व के उल्लास को कई गुना बढ़ा देता है। इसे शंखनाद के समान ही अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है।

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