बहुत लोग भाई बने, सब छोड़कर चले गए’… उमाशंकर सिंह के निधन पर बिलख पड़ीं मायावती, भर आईं आंखें

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का एक बेहद भावुक और झकझोर देने वाला रूप सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। बसपा के वरिष्ठ और वफादार विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद जब मायावती उनके आवास पर शोक व्यक्त करने और श्रद्धांजलि देने पहुंचीं, तो उनका दर्द आंसुओं के रूप में छलक उठा। पार्टी के संकट के दौर में और हर कदम पर चट्टान की तरह साथ खड़े रहने वाले नेता को खोने के बाद मायावती का गला रुंध गया। इस दौरान उनके मुंह से निकले शब्द 'बहुत लोग भाई बने, सब छोड़कर चले गए…' ने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच कड़े तेवर के लिए पहचानी जाने वाली मायावती का यह विचलित करने वाला वीडियो और बयान इस समय सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।
बसपा के संकटमोचक थे उमाशंकर सिंह, वफादारी के हर इम्तिहान में उतरे खरे
उत्तर प्रदेश की राजनीति में उमाशंकर सिंह को बसपा के सबसे ताकतवर, जुझारू और भरोसेमंद नेताओं में शुमार किया जाता था। जब पार्टी के कई दिग्गज नेता और विधायक सत्ता के मोह में या अन्य कारणों से बसपा का दामन छोड़कर दूसरी पार्टियों में जा रहे थे, तब उमाशंकर सिंह ने आखिरी सांस तक पार्टी और सुप्रीमो मायावती के प्रति अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी। मायावती के लिए वह सिर्फ एक विधायक या नेता नहीं थे, बल्कि पार्टी के बुरे दौर में एक मजबूत स्तंभ और सच्चे भाई की तरह हर मुश्किल वक्त में ढाल बनकर खड़े रहे थे। उनके अचानक हुए निधन से बसपा को एक ऐसा कभी न भरने वाला राजनीतिक झटका लगा है, जिसकी भरपाई करना पार्टी के लिए बेहद मुश्किल साबित होगा।
श्रद्धांजलि सभा में छलका पुराना दर्द, वफादारों के जाने का मलाल आया सामने
उमाशंकर सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करने के दौरान मायावती का भावुक होना इस बात का गवाह है कि सियासत की इस अंधी दौड़ में अपनों का साथ छूटना कितना दर्दनाक होता है। अपने इस बयान के जरिए उन्होंने इशारों-इशारों में उन तमाम नेताओं और सहयोगियों पर भी करारा तंज कसा जो पार्टी के अच्छे दिनों में साथ रहे लेकिन मुश्किल वक्त आते ही पाला बदलकर चले गए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक कद्दावर नेता के जाने से जहां एक ओर बसपा का जमीनी संगठन कमजोर हुआ है, वहीं मायावती के इस खुले और भावुक अंदाज ने साबित कर दिया है कि राजनीति के इस दौर में सच्ची वफादारी और इंसानियत के रिश्ते आज भी मायने रखते हैं।