बारिश के मौसम में भी भट्टी की तरह तपता रहा भारत: अगस्त में टूटा 125 साल का गर्मी का रिकॉर्ड, मौसम विभाग ने बताई चौंकाने वाली वजह

सावन-भादों के जिस महीने में आसमान से बादलों के बरसने और ठंडी फुहारों से मौसम सुहावना रहने की उम्मीद की जाती है, उसी अगस्त के महीने में पूरे भारत को झुलसा देने वाली गर्मी और भारी उमस का सामना करना पड़ा। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी किए गए ऐतिहासिक आंकड़ों ने पर्यावरण वैज्ञानिकों और आम नागरिकों दोनों को हैरत में डाल दिया है। वर्ष 1901 में आधिकारिक मौसम रिकॉर्ड रखे जाने की शुरुआत के बाद से, यानी पिछले 125 सालों के इतिहास में यह अगस्त देश का सबसे गर्म (Warmest August) महीना दर्ज किया गया है। मॉनसून के पीक सीजन में तापमान का इस स्तर तक चढ़ जाना जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और मौसमी चक्र में आ रहे विकराल बदलावों की गंभीर चेतावनी दे रहा है।
125 साल का रिकॉर्ड टूटा: आंकड़ों में समझिए असामान्य गर्मी का स्तर
आईएमडी के आधिकारिक डेटा के अनुसार, अगस्त महीने में पूरे देश का औसत मासिक तापमान (Mean Temperature) 28.01 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो 1991 से 2020 के सामान्य औसत से लगभग 0.67 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर तापमान का रिकॉर्ड वर्ष 1901 से दर्ज किया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2023 और उसके बाद के वर्षों में भी गर्म अगस्त देखे गए थे, लेकिन इस बार के आंकड़ों ने 125 वर्षों के इतिहास को पीछे छोड़ दिया है। दिन के समय पड़ने वाली चिलचिलाती धूप तो परेशान कर ही रही थी, लेकिन सबसे चौंकाने वाला बदलाव रात के पारे में देखा गया, जिसने मौसम वैज्ञानिकों के भी कान खड़े कर दिए हैं।
रातें बन गईं 'तंदूर': न्यूनतम तापमान ने रचा नया इतिहास
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी महीने के असामान्य रूप से गर्म होने के लिए केवल दोपहर की चिलचिलाती धूप ही जिम्मेदार नहीं होती, बल्कि रात के समय तापमान में गिरावट न होना सबसे घातक साबित होता है। इस अगस्त महीने में भारत का औसत न्यूनतम तापमान (Night-time Temperature) 24.36 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 0.68 डिग्री सेल्सियस ज्यादा है। 1901 के बाद से अब तक किसी भी अगस्त में रात का इतना अधिक औसत न्यूनतम तापमान कभी दर्ज नहीं किया गया था। आमतौर पर बारिश के बाद रातें ठंडी हो जाती हैं, लेकिन इस बार रात के समय भी उमस और गर्मी से कोई राहत नहीं मिली। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में तो रातों का तापमान इतिहास के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया, जिसने पूरे महीने के औसत तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया।
मॉनसून में लंबी खामोशी और 16 फीसदी कम बारिश मुख्य कारण
मॉनसून के मौसम में तापमान को नियंत्रित रखने का काम घने बादल और लगातार होने वाली बारिश करती है। जब जमीन गीली होती है, तो सौर विकिरण (Solar Radiation) का असर कम होता है और वाष्पीकरण से प्राकृतिक ठंडक बनी रहती है। हालांकि, इस अगस्त में मॉनसून ट्रफ का असमान वितरण रहा और देश के कई हिस्सों में मॉनसून पर लंबा ब्रेक (Monsoon Break) लग गया। मौसम विभाग के मुताबिक, पूरे महीने में देश भर में सामान्य से लगभग 16.3% कम बारिश दर्ज की गई। जो बारिश हुई भी, वह कुछ चुनिंदा इलाकों (जैसे उत्तर-पश्चिम और पूर्व-मध्य भारत) में बादलों के फटने या भारी स्पेल के रूप में हुई। देश के बाकी बड़े हिस्से कई हफ्तों तक सूखे और तेज धूप की चपेट में रहे, जिससे सूखी जमीन ने सूर्य की गर्मी को तेजी से सोखा और वातावरण भट्टी की तरह तपता रहा।
अल नीनो और प्रशांत महासागर का बढ़ता तापमान
इस ऐतिहासिक गर्मी के पीछे वैश्विक स्तर पर सक्रिय 'अल नीनो' (El Niño) मौसमी परिघटना को सबसे बड़ा कारक माना जा रहा है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान (Sea Surface Temperature) सामान्य से काफी अधिक गर्म दर्ज किया गया। जब प्रशांत महासागर असामान्य रूप से गर्म होता है, तो वह पूरी दुनिया के वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) को बिगाड़ देता है। ऐतिहासिक रूप से अल नीनो का भारतीय मॉनसून पर नकारात्मक असर पड़ता है, जिससे मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बारिश में भारी कमी आ जाती है। इस वैश्विक वेदर पैटर्न ने भारतीय उपमहाद्वीप पर उच्च दबाव का क्षेत्र बनाकर मानसूनी बादलों को सक्रिय नहीं होने दिया।
ग्लोबल वार्मिंग और स्थानीय पर्यावरण पर इसका घातक असर
मौसम विशेषज्ञों और जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि अगस्त महीने का यह रिकॉर्ड-ब्रेकिंग तापमान केवल एक मौसमी संयोग नहीं है, बल्कि यह अनियंत्रित ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) का प्रत्यक्ष परिणाम है। कंक्रीट के फैलते जंगलों और हरियाली के खत्म होने से शहरों में 'अर्बन हीट आइलैंड' (Urban Heat Island) का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे रात के समय कंक्रीट की इमारतें और सड़कें दिनभर की गर्मी को बाहर छोड़ती हैं और रातें ठंडी नहीं हो पातीं। अत्यधिक गर्मी और बारिश की इस अनियमितता का सीधा असर खरीफ फसलों, विशेषकर धान, दालों और तिलहन पर पड़ रहा है। इसके साथ ही भूजल स्तर में गिरावट और जलाशयों में पानी की कमी से आने वाले समय में पेयजल और सिंचाई संकट गहराने का अंदेशा भी बढ़ गया है।
आने वाले समय में कैसे रहेंगे मौसमी हालात
मौसम विभाग ने आगाह किया है कि सितंबर महीने में भी देश के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान और वर्षा के असमान वितरण की संभावना बनी रह सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत को अब इस 'न्यू नॉर्मल' (New Normal) के लिए तैयार रहना होगा, जहां बारिश के मौसम में भी लू और भीषण गर्मी के थपेड़े झेलने पड़ सकते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों ने सरकारों और समाज से अपील की है कि वे कार्बन उत्सर्जन घटाने, शहरों में ग्रीन कवर बढ़ाने और जल संरक्षण के उपायों को युद्धस्तर पर लागू करें, ताकि भविष्य में इस तरह के चरम मौसमी संकटों से जीवन और अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके।