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विदेश जाने से पहले जान लें सच्चाई: ऑस्ट्रेलिया शिफ्ट हुई भारतीय महिला को लगा बड़ा झटका, सोशल मीडिया पर बताई वहां की जमीनी हकीकत

लाखों भारतीय युवाओं और पेशेवरों के लिए विदेश जाकर बसना, विदेशी मुद्रा में मोटी तनख्वाह कमाना और एक शानदार लाइफस्टाइल जीना किसी सुनहरे सपने जैसा होता है। कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया भी लंबे समय से भारतीय प्रवासियों (Indian Expats) की शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। लेकिन सोशल मीडिया और रील्स की चकाचौंध के पीछे विदेश की असल जिंदगी कितनी कठिन और तनावपूर्ण हो सकती है, इसका खुलासा हाल ही में ऑस्ट्रेलिया शिफ्ट हुई एक भारतीय महिला ने किया है। महिला ने एक विस्तृत सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो के जरिए ऑस्ट्रेलिया के महानगरों में रहने की जमीनी हकीकत, छिपे हुए खर्चे, किराए का संकट और गहरे मानसिक अकेलेपन को साझा किया है, जो अब इंटरनेट पर जमकर वायरल हो रहा है।

सपनों का देश बनाम जमीनी संघर्ष: क्यों टूटा महिला का भ्रम

भारतीय महिला के अनुसार, भारत में रहते हुए जब लोग इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ऑस्ट्रेलिया के खूबसूरत समुद्र तट, सिडनी हार्बर, मेलबर्न की साफ-सुथरी सड़कें और खुली फिजाएं देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि वहां की जिंदगी किसी जन्नत से कम नहीं है। हालांकि, जब कोई व्यक्ति स्थायी रूप से (PR या वर्क वीजा पर) वहां रहने पहुंचता है, तो पहले ही महीने में उसका यह रोमांटिक भ्रम टूट जाता है। महिला ने बताया कि भारत में मिडिल क्लास या अपर मिडिल क्लास लाइफस्टाइल जीने वाले लोगों को ऑस्ट्रेलिया में प्राथमिक बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी दिन-रात मशक्कत करनी पड़ती है।

हाउसिंग क्राइसिस: किराए पर एक कमरा ढूंढना बन गया जंग

महिला ने अपने अनुभव में जिस सबसे बड़ी समस्या का जिक्र किया, वह है ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख शहरों (जैसे सिडनी, मेलबर्न, ब्रिस्बेन) में चल रहा ऐतिहासिक 'रेंटल क्राइसिस' (Rental Crisis)। महिला ने बताया कि वहां रहने के लिए एक साधारण सा 1-BHK या 2-BHK अपार्टमेंट खोजना किसी बड़ी जंग जीतने जैसा है। एक-एक खाली फ्लैट के निरीक्षण (Inspection) के लिए सैकड़ों लोग कतारों में खड़े रहते हैं। मकान मालिक और रियल एस्टेट एजेंट्स आवेदकों से भारी डिपॉजिट, कई महीनों का एडवांस किराया और बैंक बैलेंस का विस्तृत ब्योरा मांगते हैं। इसके बावजूद हर हफ्ते 500 से 800 ऑस्ट्रेलियन डॉलर (लगभग 28,000 से 45,000 रुपये प्रति सप्ताह) सिर्फ किराए में चले जाते हैं। कमाई का 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा केवल छत की व्यवस्था करने में खर्च हो जाता है।

महंगाई की मार और टैक्स का भारी बोझ

महिला ने वहां के जीवन-यापन की लागत (Cost of Living) का हिसाब साझा करते हुए बताया कि करेंसी कन्वर्जन में तनख्वाह भले ही लाखों में दिखे, लेकिन खर्चे भी उसी अनुपात में डॉलर में ही होते हैं:

  • टैक्स और कटौतियां: ऑस्ट्रेलिया में इनकम टैक्स स्लैब काफी ऊंचे हैं। आपकी मेहनत की कमाई का 30 से 37 फीसदी हिस्सा टैक्स, सुपरएनुएशन और मेडिकेयर लेवी के रूप में सरकार के पास चला जाता है।

  • दैनिक राशन और ग्रॉसरी: स्थानीय सुपरमार्केट्स (जैसे वूलवर्थ्स या कोल्स) से बुनियादी सब्जियां, दालें और फल खरीदना भी बेहद महंगा सौदा है। भारत की तुलना में दैनिक खाद्य सामग्री 4 से 5 गुना महंगी पड़ती है।

  • पब्लिक ट्रांसपोर्ट और पार्किंग: सिडनी या मेलबर्न में ट्रेन और बस का किराया काफी ज्यादा है, और यदि आप कार खरीदते हैं तो इंश्योरेंस, रजिस्ट्रेशन, टोल टैक्स और पार्किंग चार्ज जेब खाली कर देते हैं।

  • मेडिकल और डेंटल केयर: हालांकि पब्लिक हेल्थ सिस्टम (Medicare) है, लेकिन स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से मिलने के लिए महीनों का इंतजार करना पड़ता है और डेंटल व ऑप्टिकल केयर का खर्च अत्यधिक महंगा है।

हाउस हेल्प की कमी: झाड़ू-पोछे से लेकर खाना पकाने तक सब कुछ खुद

भारत में मध्यमवर्गीय परिवारों को भी कुक, मेड, सफाईकर्मी, ड्राइवर या इलेक्ट्रीशियन जैसी दैनिक घरेलू सेवाएं बेहद किफायती दरों पर आसानी से मिल जाती हैं। महिला ने जोर देकर कहा कि ऑस्ट्रेलिया में 'लेबर कॉस्ट' (श्रम की लागत) दुनिया में सबसे अधिक है। वहां किसी प्लंबर या इलेक्ट्रीशियन को घर बुलाने की विजिटिंग फीस ही 150 से 200 डॉलर (10,000 रुपये से अधिक) हो जाती है। इसके चलते हर व्यक्ति को ऑफिस की 8-9 घंटे की नौकरी के बाद घर का सारा काम—खाना बनाना, बर्तन धोना, कपड़े साफ करना, टॉयलेट की सफाई और कचरा निस्तारण—पूरी तरह खुद ही करना पड़ता है। इससे शारीरिक थकान और तनाव का स्तर लगातार उच्च बना रहता है।

गहरा सामाजिक अकेलापन और मेंटल हेल्थ की चुनौती

आर्थिक और शारीरिक संघर्ष के अलावा महिला ने जिस पहलू पर सबसे अधिक भावुक होकर बात की, वह है 'सोशल आइसोलेशन' यानी सामाजिक अकेलापन। भारत में जहां पड़ोसियों, रिश्तेदारों और दोस्तों का एक मजबूत सामाजिक ताना-बाना होता है, त्योहारों पर रौनक होती है और सुख-दुख साझा करने के लिए लोग मौजूद रहते हैं, वहीं पश्चिमी देशों में हर कोई अपनी व्यस्त जिंदगी में कैद है। महिला के अनुसार, शाम 6 बजे के बाद वहां की सड़कें और बाजार पूरी तरह सुनसान हो जाते हैं। स्थानीय लोगों के साथ सांस्कृतिक मेलजोल बैठाना आसान नहीं होता, और वीकेंड पर भी अकेलेपन का अहसास मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है।

विदेश जाने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए महत्वपूर्ण सीख

महिला का यह वीडियो उन सभी युवाओं, छात्रों और परिवारों के लिए एक जरूरी वेक-अप कॉल बनकर सामने आया है जो सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर बिना पर्याप्त वित्तीय और मानसिक तैयारी के विदेश पलायन का फैसला ले लेते हैं। सोशल मीडिया पर इस वीडियो के सामने आने के बाद कई अन्य एनआरआई (NRI) प्रवासियों ने भी कमेंट सेक्शन में अपनी सहमति जताई है और माना है कि विदेशों में बसने की एक भारी मानवीय और मनोवैज्ञानिक कीमत चुकानी पड़ती है। विशेषज्ञों की राय है कि विदेश जाने से पहले केवल वहां की सैलरी का गुणा-गणित न लगाएं, बल्कि वहां के लिविंग कॉस्ट, हाउसिंग मार्केट, टैक्स स्ट्रक्चर और पारिवारिक अकेलेपन से निपटने की अपनी क्षमता का भी ईमानदारी से मूल्यांकन जरूर करें।

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