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बुढ़ापा और मोबिलिटी: कूल्हे के दर्द को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी, ऐसे रखें खुद को सेहतमंद

बढ़ती उम्र के साथ शरीर के कई हिस्सों में दर्द आम बात मान ली जाती है, लेकिन जब बात चलने-फिरने और पैरों की गतिशीलता यानी मोबिलिटी की हो, तो किसी भी तरह की अनदेखी खतरनाक साबित हो सकती है। खासकर, बुजुर्गों में कूल्हे का दर्द (Hip Pain) केवल एक साधारण जोड़ों की समस्या नहीं है, बल्कि यह किसी अंदरूनी और गंभीर स्वास्थ्य समस्या का शुरुआती संकेत हो सकता है। उम्र के इस पड़ाव पर हड्डियों का कमजोर होना स्वाभाविक है, लेकिन यदि समय रहते इस दर्द के कारणों को न समझा जाए, तो यह स्थिति व्यक्ति को पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर बना सकती है। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली और खानपान की गलत आदतों के कारण यह समस्या तेजी से गंभीर रूप ले रही है।

दर्द को हल्के में लेना और गंभीर परिणामों की शुरुआत

अक्सर लोग बुढ़ापे के सामान्य दर्द समझकर पेनकिलर खा लेते हैं या मालिश करके काम चला लेते हैं, जो कि सबसे बड़ी गलती साबित होती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, कूल्हे के दर्द को लगातार नजरअंदाज करने से हड्डियों के टिशू तक ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होने लगता है, जिसे मेडिकल भाषा में एवेस्कुलर नेक्रोसिस (AVN) या ऑस्टियोनेक्रोसिस कहा जाता है। जब कूल्हे के जोड़ (हिप ज्वाइंट) तक पर्याप्त मात्रा में रक्त का संचार नहीं पहुंच पाता है, तो वहां की हड्डियां अंदर ही अंदर कमजोर होकर टूटने या घिसने लगती हैं। इस स्थिति में मरीज के लिए जमीन पर चलना, सीढ़ियां चढ़ना या बिस्तर से उठना भी किसी सजा से कम नहीं होता है।

इलाज में देरी से कूल्हे के जोड़ का कमजोर होना

यदि शुरुआती लक्षणों जैसे उठते-बैठते वक्त कट-कट की आवाज आना, जांघों या कमर के हिस्से में खिंचाव महसूस होना और थोड़ा सा चलने पर थक जाना को नजरअंदाज किया जाए, तो यह स्थिति जोड़ के पूरी तरह खराब होने का कारण बन सकती है। समय पर डॉक्टर से परामर्श न लेने से कूल्हे की कार्टिलेज पूरी तरह धिस जाती है, जिससे हड्डियों के सिर आपस में रगड़ खाने लगते हैं। इस अवस्था में दवाइयां भी बेअसर साबित होने लगती हैं और अंततः मरीज को हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी यानी कूल्हा प्रत्यारोपण का सहारा लेना पड़ता है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि दर्द के शुरू होते ही सही ऑर्थोपेडिक डॉक्टर से जांच कराई जाए।

आधुनिक जीवनशैली और बचाव के कारगर उपाय

बढ़ती उम्र में अपने कूल्हों और जोड़ों को स्वस्थ रखने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव करना बेहद जरूरी है। रोजाना हल्की स्ट्रेचिंग, योग और डॉक्टर की सलाह के अनुसार कम प्रभाव वाले व्यायाम करने से जोड़ों की फ्लैक्सिबिलिटी बनी रहती है। इसके अलावा, अपने आहार में कैल्शियम, विटामिन डी और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों जैसे दूध, हरी पत्तेदार सब्जियां, पनीर और ड्राई फ्रूट्स को शामिल करें। शरीर में पानी की कमी न होने दें और धूप का सेवन करें ताकि हड्डियों को प्राकृतिक रूप से मजबूती मिल सके। किसी भी प्रकार की दर्द निवारक गोलियों का सेवन खुद से करने के बजाय हमेशा विशेषज्ञ की देखरेख में ही उपचार लें।

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