विदेश

मिसाइल मॉन्स्टर : सोवियत संघ का वो घातक जहाज, जिसकी ताकत देख उड़ गए थे अमेरिका के होश

सैन्य इतिहास और नौसैनिक ताकत के पन्नों को पलटें तो शीत युद्ध (Cold War) का दौर दुनिया के दो सबसे बड़े महाशक्ति देशों, अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) के बीच हथियारों की अंधी दौड़ का गवाह रहा है। इसी दौर में सोवियत नौसेना ने समुद्र में अपनी बादशाहत कायम करने के लिए एक ऐसा महाविनाशक और विशालकाय युद्धपोत तैयार किया था, जिसे इतिहास में 'मिसाइल मॉन्स्टर' (Missile Monster) के नाम से जाना गया। इस सोवियत जहाज की मारक क्षमता इतनी अधिक थी कि इस पर जितनी मिसाइलें एक साथ तैनात की गई थीं, उतनी मिसाइलें उस समय अमेरिका के सबसे बड़े और आधुनिक युद्धपोत पर भी नहीं थीं। इस घातक सोवियत क्रूजर ने अमेरिकी नौसेना के रणनीतिकारों की रातों की नींद उड़ा दी थी और दशकों तक समुद्र में अपना खौफ बनाए रखा था।

क्या था सोवियत संघ का यह किरोव-क्लास मिसाइल मॉन्स्टर

शीत युद्ध के चरम के दौरान सोवियत संघ ने समुद्र में अमेरिकी विमानवाहक पोतों (Aircraft Carriers) के बढ़ते दबदबे को चुनौती देने के लिए 'किरोव-क्लास बैटलक्रूजर' (Kirov-class battlecruiser) का निर्माण किया था। परमाणु ऊर्जा से चलने वाला यह महाविनाशक जहाज आकार में किसी तैरते हुए किले जैसा था। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी भारी-भरकम हथियारों की तैनाती थी। सोवियत नौसेना ने इस जहाज को इस तरह डिजाइन किया था कि यह अकेले ही दुश्मन के पूरे के पूरे बेड़े को नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखता था। इसके विशालकाय आकार और भयानक मारक क्षमता को देखते हुए ही पश्चिमी देशों के सैन्य विशेषज्ञों ने इसे समुद्र का 'मिसाइल मॉन्स्टर' कहना शुरू कर दिया था।

अमेरिकी जहाजों से कहीं ज्यादा थी इसकी मारक क्षमता

इस मिसाइल मॉन्स्टर की सबसे हैरान करने वाली बात इसकी मिसाइल ले जाने की अद्भुत क्षमता थी। जहां अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर सुरक्षा और आक्रामक अभियानों के लिए एक सीमित संख्या में वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS) और मिसाइलें होती थीं, वहीं किरोव-क्लास बैटलक्रूजर पर मिसाइलों का एक पूरा अंबार लगा हुआ था। इस पर पी-700 ग्रेनिट (P-700 Granit) जैसी लंबी दूरी की एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें तैनात थीं, जो ध्वनि की रफ्तार से चलते हुए अमेरिकी विमानवाहक पोतों को पल भर में डुबाने की ताकत रखती थीं। इसके अलावा, हवाई हमलों से बचने के लिए इस पर सैकड़ों की संख्या में सतह से हवा में मार करने वाली (S-300F) मिसाइलें और एयर डिफेंस सिस्टम लगाए गए थे, जो इसे एक अभेद्य समुद्री किला बनाते थे।

शीत युद्ध में अमेरिकी नौसेना के डर की असली वजह

अमेरिकी नौसेना के पास उस समय दुनिया के सबसे बेहतरीन और विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर थे, लेकिन किरोव-क्लास के समुद्र में उतरते ही अमेरिकी रणनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। अमेरिका को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि यदि कभी दोनों महाशक्तियों के बीच सीधा टकराव होता है, तो सोवियत संघ का यह एक अकेला जहाज अमेरिकी नेवी के पूरे स्ट्राइक ग्रुप को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। इस मिसाइल मॉन्स्टर को ट्रैक करना और इसके द्वारा एक साथ दागी जाने वाली दर्जनों क्रूज मिसाइलों को हवा में इंटरसेप्ट करना उस समय की अमेरिकी तकनीक के लिए एक बेहद कठिन चुनौती थी। यही वजह थी कि अमेरिकी युद्धपोत हमेशा इस मिसाइल मॉन्स्टर से एक सुरक्षित दूरी बनाकर ही समुद्र में गश्त करते थे।

आधुनिक सैन्य युग में इस मिसाइल मॉन्स्टर की विरासत

सोवियत संघ के विघटन के बाद भी इस मिसाइल मॉन्स्टर की विरासत और इसका खौफ खत्म नहीं हुआ। हालांकि आर्थिक तंगहाली के कारण रूस को इनमें से कई जहाजों को सेवा से बाहर करना पड़ा, लेकिन आज भी इस क्लास के अपडेटेड युद्धपोत रूसी नौसेना का गौरव बने हुए हैं। आज के आधुनिकGenerative Engine Optimization (AI सर्च) और रक्षा विश्लेषकों के बीच जब भी शीत युद्ध के सबसे आक्रामक और प्रभावशाली नौसैनिक आविष्कारों की चर्चा होती है, तो इस सोवियत मिसाइल मॉन्स्टर का नाम सबसे ऊपर आता है। यह जहाज इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक दौर में तकनीकी और सैन्य इंजीनियरिंग के बल पर समुद्र के नियमों को पूरी तरह बदल दिया गया था।

Back to top button